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Climate and Monsoon — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Geography · UPSC CSE
प्रश्न: भारतीय मानसून को संचालित करने में तिब्बती पठार की भूमिका — तंत्र, मौसमी गतिकी और जलवायु महत्त्व

प्रस्तावना

तिब्बती पठार, विश्व का सर्वोच्च एवं विशालतम उन्नत भूखंड, एक विराट वायुमंडलीय ताप-इंजन के रूप में कार्य करता है, जो मौसमी विभेदक तापन के माध्यम से दक्षिण एशियाई मानसून गतिकी को गहराई से प्रभावित करता है।

मुख्य बिंदु

1. ग्रीष्मकालीन ताप-स्रोत एवं उच्च-स्तरीय प्रतिचक्रवात

ग्रीष्म ऋतु में तिब्बती पठार तीव्र सौर विकिरण अवशोषित कर संवेदनशील ऊष्मा प्रवाह द्वारा वायुमंडल को गर्म करता है, जिससे यह एक उन्नत ताप-स्रोत बन जाता है। इससे ऊपरी क्षोभमंडल में 'Tibetan High' नामक प्रतिचक्रवात निर्मित होता है, जो परिपक्व मानसून परिसंचरण की विशिष्ट पहचान है। इस प्रतिचक्रवात से उत्पन्न अपसरण, भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न-स्तरीय अभिसरण को सुदृढ़ कर मानसूनी वर्षा को बनाए रखता है।

2. मानसून का उत्तर की ओर खिंचाव

तिब्बती पठार के तप्त क्षेत्र एवं अपेक्षाकृत शीतल हिंद महासागर के मध्य तापीय प्रवणता एक मध्याह्न दाब-अंतर उत्पन्न करती है, जो Inter-Tropical Convergence Zone को उत्तर की ओर खींचती है। यह उन्नत तापन, स्थल-समुद्र तापीय विभेद को पूरक बल प्रदान कर दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन एवं उत्तरवर्ती प्रसार को त्वरित करता है। जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि पठारी तापन के अभाव में मानसून दुर्बल एवं निम्न अक्षांशों तक सीमित रहता।

3. शीतकालीन गतिकी — ताप-स्रोत नहीं, शीत अवरोध

शीत ऋतु में तिब्बती पठार ताप-स्रोत के बजाय शीत-अवशोषक एवं यांत्रिक अवरोध के रूप में कार्य करता है। यह महाद्वीपीय शीत वायु को दक्षिण की ओर प्रवेश करने से रोकता है तथा पश्चिमी जेट धाराओं को विक्षेपित करता है। प्रायद्वीपीय भारत का उत्तर-पूर्वी मानसून मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी एवं Bay of Bengal पर विभेदक शीतलन से संचालित होता है, न कि पठारी तापन से।

4. नीतिगत प्रासंगिकता — जलवायु परिवर्तन एवं मानसून परिवर्तनशीलता

तिब्बती पठार पर त्वरित तापन एवं हिमनद अपक्षय उसकी तापीय विशेषताओं को परिवर्तित कर रहे हैं, जिसके मानसून के आगमन, तीव्रता एवं वितरण पर गंभीर निहितार्थ हैं। भारत में कृषि नियोजन, जल संसाधन प्रबंधन एवं आपदा तैयारी हेतु पठार-मानसून दूरसंचार (teleconnections) का सटीक मॉडलन अनिवार्य होता जा रहा है।

निष्कर्ष

ग्रीष्मकालीन ताप-स्रोत के रूप में मानसून परिसंचरण को संचालित करने में तिब्बती पठार की भूमिका सुस्थापित है; शीतकाल में इसका प्रभाव तापन के बजाय यांत्रिक अवरोध के माध्यम से संचालित होता है। भारत की खाद्य एवं जल सुरक्षा को प्रभावित करने वाले दीर्घकालिक मानसूनी परिवर्तनों के पूर्वानुमान हेतु पठारी तापीय परिवर्तनों की निगरानी अपरिहार्य है।

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