वायुमंडल आने वाले लघु-तरंग सौर विकिरण के प्रति मुख्यतः पारदर्शी है, किंतु दीर्घ-तरंग भौमिक विकिरण का कुशल अवशोषक है। इस कारण पृथ्वी की सतह से पुनः उत्सर्जित विकिरण ही वायुमंडलीय तापन का प्राथमिक कारक है।
आने वाला सौर विकिरण मुख्यतः लघु-तरंग (दृश्य एवं पराबैंगनी) प्रकृति का होता है। वायुमंडल इसका केवल एक अल्प अंश ही सीधे अवशोषित करता है; अधिकांश विकिरण पृथ्वी की सतह तक पहुँचकर उसे गर्म करता है। अतः प्रत्यक्ष सौर अवशोषण वायुमंडलीय तापमान में एक गौण योगदानकर्ता है।
पृथ्वी की सतह गर्म होने के पश्चात दीर्घ-तरंग अवरक्त विकिरण के रूप में ऊर्जा पुनः उत्सर्जित करती है। ग्रीनहाउस गैसें — कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड — इस दीर्घ-तरंग विकिरण को दक्षतापूर्वक अवशोषित कर सभी दिशाओं में पुनः विकिरित करती हैं, जिससे निचला वायुमंडल गर्म होता है। यही तंत्र वायुमंडलीय तापन का प्रमुख कारक है।
ग्रीनहाउस गैसों की आणविक संरचना दीर्घ-तरंग अवरक्त तरंगदैर्ध्य के साथ अनुनाद करती है, जिससे प्रबल अवशोषण संभव होता है। कार्बन डाइऑक्साइड अपेक्षाकृत अल्प सांद्रता में होने पर भी इस अवशोषण बैंड में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। यही कारण है कि मानवजनित CO₂ उत्सर्जन ग्रीनहाउस प्रभाव को तीव्र कर सतह के तापमान में वृद्धि करता है।
यह समझ कि भौमिक विकिरण वायुमंडलीय तापन को संचालित करता है, जलवायु न्यूनीकरण नीतियों का वैज्ञानिक आधार है। ग्रीनहाउस गैस सांद्रता में कमी से दीर्घ-तरंग अवशोषण सीधे सीमित होता है। भारत की National Action Plan on Climate Change तथा Paris Agreement जैसे अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे इसी वायुमंडलीय भौतिकी पर आधारित हैं।
Statement-I असत्य है — वायुमंडल को मुख्यतः भौमिक विकिरण गर्म करता है, सौर विकिरण नहीं — जबकि Statement-II सत्य है। इस तंत्र की सटीक समझ विश्वसनीय जलवायु नीति और उत्सर्जन-न्यूनीकरण प्रतिबद्धताओं का आधार है।
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