हीरे, लिथियम और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिज विश्व में असमान रूप से वितरित हैं, जिससे संसाधन-समृद्ध राष्ट्र वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा रूपांतरण एवं औद्योगिक नीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
बोत्सवाना विश्व के सबसे बड़े हीरा उत्पादकों में गिना जाता है। Jwaneng और Orapa खदानें राष्ट्रीय GDP एवं सरकारी राजस्व में उल्लेखनीय योगदान देती हैं। De Beers के साथ Debswana साझेदारी मॉडल को उप-सहारा अफ्रीका में संसाधन राजस्व प्रबंधन के अपेक्षाकृत सफल उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है, जो सार्वजनिक सेवाओं एवं अवसंरचना को वित्तपोषित करता है।
चिली के पास विश्व के सबसे बड़े लिथियम भंडार हैं, जो Atacama नमक मैदानों में केंद्रित हैं। विद्युत वाहन संक्रमण के साथ लिथियम-आयन बैटरी की मांग बढ़ने से Argentina और Bolivia के साथ साझा 'Lithium Triangle' में चिली की स्थिति स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण हो गई है। चिली की राष्ट्रीय लिथियम नीति निष्कर्षण एवं मूल्य संवर्धन में अधिक राज्य भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है।
इंडोनेशिया के पास विश्व के सर्वाधिक ज्ञात निकेल भंडार हैं, जो स्टेनलेस स्टील एवं बैटरी कैथोड निर्माण के लिए अनिवार्य है। Jakarta की कच्चे निकेल अयस्क निर्यात पर प्रतिबंध की नीति ने वैश्विक निकेल बाजारों को पुनर्गठित किया है तथा स्मेल्टिंग एवं बैटरी अग्रदूत उद्योगों में पर्याप्त विदेशी निवेश आकर्षित किया है।
संसाधन प्रचुरता स्वतः विकास में परिवर्तित नहीं होती। वस्तु मूल्य अस्थिरता, Dutch Disease का जोखिम, पर्यावरणीय क्षरण एवं संस्थागत क्षमता की कमी दीर्घकालिक लाभों को कमजोर कर सकती है। प्रभावी खनिज शासन के लिए पारदर्शी राजस्व ढाँचे, पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय एवं मूल्य श्रृंखला में ऊपर बढ़ने हेतु सुविचारित औद्योगिक नीति आवश्यक है।
तीनों देश-संसाधन युग्म सही रूप से सुमेलित हैं। खनिज संपदा को दीर्घकालिक विकास में रूपांतरित करने के लिए ऐसे शासन ढाँचे अपेक्षित हैं जो निष्कर्षण राजस्व, पर्यावरणीय संरक्षण एवं औद्योगिक विविधीकरण के मध्य संतुलन स्थापित करें।
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