चट्टानों की पारगम्यता और सरंध्रता भूजल प्रवाह, जलभृत निर्माण तथा भू-दृश्य विकास को नियंत्रित करती हैं। जल-भूविज्ञान और भूमि-उपयोग नियोजन के लिए यह समझ आधारभूत महत्त्व रखती है।
सरंध्रता किसी चट्टान में रिक्त स्थानों के अनुपात को दर्शाती है, जबकि पारगम्यता उस सुगमता को मापती है जिससे जल उसमें प्रवाहित हो सके। यदि रंध्र परस्पर संयुक्त न हों तो चट्टान सरंध्र होते हुए भी अपारगम्य हो सकती है। यह अंतर जलभृत और जलरोधी परतों के वर्गीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
Chalk सरंध्र और पारगम्य दोनों होती है। इसके परस्पर संयुक्त रंध्र जल को अवशोषित एवं संचारित करने में सक्षम होते हैं, जिससे Chalk संरचनाएँ महत्त्वपूर्ण जलभृत बनती हैं। जल-भूवैज्ञानिक दृष्टि से Chalk एक असीमित जलभृत के रूप में कार्य करती है और अनेक क्षेत्रों में भूजल निष्कर्षण को आधार प्रदान करती है।
Clay उल्लेखनीय रूप से सरंध्र होती है और अपने सूक्ष्म कणों में पर्याप्त जल धारण कर सकती है, परंतु इसके रंध्र अत्यंत छोटे और अल्प-संयुक्त होते हैं, जिससे जल प्रवाह अत्यधिक बाधित होता है। इस प्रकार Clay अपनी सरंध्रता के बावजूद अत्यंत अपारगम्य होती है और एक प्रभावी जलरोधी परत के रूप में कार्य करती है।
चट्टानों की पारगम्यता के गलत वर्गीकरण से भूजल प्रबंधन, बाँध-स्थल चयन और बाढ़-जोखिम आकलन में गंभीर त्रुटियाँ उत्पन्न होती हैं। सटीक चट्टान-विश्लेषण जलागम प्रबंधन, सिंचाई नियोजन तथा तटबंधों एवं भूमि-भराव स्थलों जैसी अवसंरचना के निर्माण को सुदृढ़ आधार प्रदान करता है।
कथन III तथ्यात्मक रूप से असत्य है — Clay सरंध्र होती है किंतु अपारगम्य, न कि असरंध्र। चट्टान-जल अन्योन्यक्रिया की सटीक समझ, टिकाऊ भूजल शासन और सुदृढ़ अवसंरचना नियोजन के लिए अपरिहार्य है।
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