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Indian Agriculture — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Geography · UPSC CSE
प्रश्न: भारत में स्थानांतरणशील कृषि — प्रथाएँ, पारिस्थितिक निहितार्थ और नीतिगत दृष्टिकोण

प्रस्तावना

स्थानांतरणशील कृषि, जो भारत के जनजातीय समुदायों द्वारा सदियों से अपनाई जाती रही है, सांस्कृतिक पहचान, वन पारिस्थितिकी और कृषि नीति के संगम पर स्थित है — जिसके लिए व्यापक प्रतिबंध के बजाय सूक्ष्म शासन-दृष्टि अपेक्षित है।

मुख्य बिंदु

1. क्षेत्रीय नामकरण और व्यापकता

यह प्रथा पूर्वोत्तर भारत में 'Jhum', आंध्र प्रदेश और ओडिशा में 'Podu', मध्य प्रदेश में 'Bewar' तथा पश्चिमी घाट के कुछ भागों में 'Kumri' के नाम से जानी जाती है। ये भिन्नताएँ विभिन्न जनजातीय समुदायों और कृषि-पारिस्थितिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करती हैं, जो यह स्पष्ट करती हैं कि यह कृषि एकरूप नहीं, बल्कि अनुकूलनशील रणनीतियों का विविध समुच्चय है।

2. पारिस्थितिक तर्क और आवर्तन-आधारित प्रणाली

यह प्रणाली आवर्तन चक्र पर आधारित है — वनाच्छादित या परती ढलानों को साफ कर एक से तीन मौसम तक खेती की जाती है, फिर प्राकृतिक पुनर्जनन हेतु भूमि छोड़ दी जाती है। परंपरागत रूप से 10–15 वर्षीय चक्र पारिस्थितिक दृष्टि से टिकाऊ रहा है। किंतु जनसंख्या दबाव और भूमि की कमी के कारण चक्र के संकुचन से मृदा क्षरण और वन-ह्रास में तेजी आई है।

3. नीतिगत रुख — उन्मूलन नहीं, संक्रमण

National Policy for Farmers तथा संबंधित जनजातीय कल्याण ढाँचे सामान्यतः स्थानांतरणशील कृषकों को स्थायी एवं टिकाऊ कृषि की ओर संक्रमण का समर्थन करते हैं। बागवानी, कृषि-वानिकी और मृदा संरक्षण को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएँ Forest Rights Act के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सामुदायिक अधिकारों का सम्मान करते हुए वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने का प्रयास करती हैं।

4. शासन-संबंधी चुनौतियाँ

प्रभावी संक्रमण के लिए सुरक्षित भूमि-स्वामित्व, ऋण तक पहुँच और बाजार संपर्क आवश्यक हैं — जो दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में अभी भी अपर्याप्त हैं। इन संरचनात्मक कमियों को दूर किए बिना स्थायी कृषि थोपने से खाद्य असुरक्षा गहरी हो सकती है और समुदाय अपनी परंपरागत ज्ञान-प्रणालियों से विस्थापित हो सकते हैं।

निष्कर्ष

स्थानांतरणशील कृषि के लिए एक संतुलित नीतिगत प्रतिक्रिया अपेक्षित है — जो भूमि-स्वामित्व सुरक्षा, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और आजीविका विविधीकरण को एकसाथ समाहित करे। इसे केवल पर्यावरणीय समस्या मानना इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ों और इसमें निहित अनुकूलनशील ज्ञान की अनदेखी करना होगा।

शब्द गणना: 308

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