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Indian Geography / Rivers — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Geography · UPSC CSE
प्रश्न: गंगा की हिमालयी सहायक नदियाँ — उनकी स्थानिक व्यवस्था और जलविज्ञानीय महत्त्व

प्रस्तावना

प्रयागराज के पूर्व में गंगा का अपवाह तंत्र उत्तर से मिलने वाली प्रमुख हिमालयी सहायक नदियों द्वारा निर्मित होता है, जो विशिष्ट जल-प्रवाह, अवसाद भार और बाढ़ गतिकी के माध्यम से सिंधु-गंगा मैदान को प्रभावित करती हैं।

मुख्य बिंदु

1. प्रमुख सहायक नदियों का पश्चिम-से-पूर्व क्रम

प्रयागराज से अनुप्रवाह की ओर बढ़ने पर उत्तर से गंगा में मिलने वाली प्रमुख हिमालयी नदियों का क्रम इस प्रकार है: Gomti (वाराणसी के निकट), Ghaghra (छपरा के निकट), Gandak (हाजीपुर/पटना के निकट), और Kosi (बिहार के Kursela के निकट)। Sone नदी दक्षिण से मिलती है और बाएँ तट की हिमालयी नदियों को दाएँ तट की प्रायद्वीपीय नदियों से पृथक् करने में संदर्भ-बिंदु का कार्य करती है।

2. जलविज्ञानीय एवं बाढ़ प्रबंधन महत्त्व

ये नदियाँ नेपाल और तिब्बती पठार से निकलती हैं तथा भारी हिमपिघलन एवं मानसूनी जल प्रवाहित करती हैं। Kosi ऐतिहासिक रूप से अपना मार्ग परिवर्तन करने के लिए जानी जाती है और सदियों में पश्चिम की ओर खिसकती रही है, जिससे इसे 'बिहार का शोक' कहा जाता है। इन नदियों पर बाढ़ प्रबंधन हेतु नेपाल के साथ द्विपक्षीय समन्वय आवश्यक है, क्योंकि Kosi Barrage जैसी संरचनाएँ संधि-ढाँचे के अंतर्गत संचालित होती हैं।

3. अवसाद निक्षेपण एवं कृषि संबंध

हिमालयी सहायक नदियाँ तराई और मध्य गांगेय मैदानों में उर्वर जलोढ़ निक्षेपित करती हैं, जिससे उच्च कृषि उत्पादकता बनी रहती है। तथापि, अत्यधिक अवसादन से नदी-तल ऊँचा होता जाता है, जिससे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनुप्रवाह जिलों में बाढ़ की संवेदनशीलता बढ़ती है और तटबंध-आधारित बाढ़ नियंत्रण रणनीतियाँ अपर्याप्त सिद्ध होती हैं।

4. नीति एवं शासन आयाम

National Water Policy एकीकृत बेसिन प्रबंधन पर बल देती है, किंतु अंतर-राज्यीय और सीमापारीय समन्वय अभी भी अपर्याप्त है। National Perspective Plan के अंतर्गत Kosi–Mechi और Gandak–Ganga जैसी नदी-जोड़ो परियोजनाएँ अधिशेष जल के पुनर्वितरण का लक्ष्य रखती हैं, परंतु ये पारिस्थितिक एवं राजनयिक जटिलताओं से घिरी हैं।

निष्कर्ष

गंगा की हिमालयी सहायक नदियों के प्रभावी शासन के लिए तटबंध-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर बेसिन-स्तरीय नियोजन, नेपाल के साथ सीमापारीय सहयोग और जलवायु-अनुकूल बाढ़ पूर्वानुमान प्रणालियों को अपनाना अनिवार्य है, ताकि मध्य गांगेय मैदान की करोड़ों जनसंख्या की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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