काल बैसाखी, अर्थात् 'बैसाख मास की आपदा', पूर्व-मानसून काल (मार्च से मई) में पूर्वी भारत को प्रभावित करने वाले उग्र संवहनीय तड़ित-झंझावात हैं, जो इस क्षेत्र की जलवायु, आजीविका और कृषि चक्र को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं।
ये तूफान अचानक उत्पन्न होने वाली तीव्र आँधियों, गर्जन, बिजली और भारी वर्षा से युक्त होते हैं तथा सामान्यतः अपराह्न या सायंकाल में आते हैं। इनकी अधिकतम आवृत्ति बांग्ला मास बैसाख (अप्रैल–मई) में होती है, जिससे इन्हें यह नाम मिला। इनकी अल्पकालिक किन्तु प्रचंड प्रकृति इन्हें सतत मानसूनी वर्षा से स्पष्टतः अलग करती है।
काल बैसाखी का उद्भव Indo-Gangetic Plain पर प्रवाहित शुष्क एवं उष्ण पश्चिमी पवनों तथा Bay of Bengal से आने वाली आर्द्र वायुराशि के परस्पर संघर्ष से होता है। यह विपरीतता तीव्र संवहनीय अस्थिरता उत्पन्न करती है, जिससे cumulonimbus मेघ निर्मित होते हैं। Coriolis प्रभाव और स्थानीय स्थलाकृति West Bengal तथा Assam में इनकी तीव्रता को और बढ़ाते हैं।
वृक्षों को उखाड़ने और अवसंरचना को क्षति पहुँचाने की विनाशकारी क्षमता के बावजूद, काल बैसाखी वर्षा-संवेदनशील फसलों को पूर्व-मानसून आर्द्रता प्रदान करती है। West Bengal में जूट की खेती और Assam में चाय बागानों को इस वर्षा से पर्याप्त लाभ मिलता है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन से पूर्व मृदा-आर्द्रता की पूर्ति करती है।
West Bengal और Assam के राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, India Meteorological Department की nowcasting प्रणाली के माध्यम से पूर्व-चेतावनी जारी करते हैं। इन तूफानों की अनिश्चित तीव्रता को देखते हुए, कृषकों और ग्रामीण अवसंरचना हेतु सामुदायिक स्तर पर तैयारी सुदृढ़ करना एक प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता है।
काल बैसाखी इस तथ्य का प्रमाण है कि एक ही मौसम-वैज्ञानिक परिघटना एक साथ जीवन के लिए संकट और कृषि उत्पादकता के लिए आधार बन सकती है। प्रभावी पूर्व-चेतावनी प्रणाली और अनुकूलनशील कृषि पद्धतियाँ इन तूफानों के पारिस्थितिक लाभों को संरक्षित करते हुए सामाजिक अनुस्थापन सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हैं।
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