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Physical Geography / Palaeo-hydrology of Indian Rivers — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Geography · UPSC CSE
प्रश्न: भारतीय नदियों का पुरा-जलविज्ञान — Pleistocene काल में Indus और Ganga तंत्रों के बीच प्राचीन नदी-मार्ग परिवर्तन के साक्ष्य

प्रस्तावना

Pleistocene काल में भारतीय उपमहाद्वीप की नदी-प्रणालियों का पुनर्गठन — विशेषतः Yamuna, Sutlej और Saraswati के बीच अनुमानित जलीय संबंध — क्षेत्रीय भू-आकृति विज्ञान, जैव-विविधता एवं प्रारंभिक मानव बस्तियों की समझ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

मुख्य बिंदु

1. जैविक साक्ष्य: उभयनिष्ठ डॉल्फिन प्रजाति

Indus और Ganga दोनों नदी-तंत्रों में एक ही मीठे जल की डॉल्फिन प्रजाति (Platanista) की उपस्थिति एक सशक्त जैव-भौगोलिक संकेतक है। वर्तमान में पृथक जलग्रहण क्षेत्रों में समान जीव-जंतुओं का पाया जाना अतीत में जलीय संयोजन का प्रमाण है, क्योंकि ऐसी प्रजातियाँ स्थलमार्ग से प्रवास नहीं कर सकतीं। यह साक्ष्य प्राचीन नदी-अपहरण की परिकल्पना को प्रत्यक्ष रूप से पुष्ट करता है।

2. पाठ्य साक्ष्य: ऋग्वैदिक नदी-सूक्त

ऋग्वेद के Nadi-Sukta में नदियों का भौगोलिक क्रम Yamuna को उत्तर-पश्चिमी (Indus) तंत्र की नदियों के साथ सूचीबद्ध करता है। विद्वान इसे उस काल की सांस्कृतिक स्मृति के रूप में व्याख्यायित करते हैं जब ये नदियाँ जलीय रूप से संबद्ध थीं, जो पुरा-जलवैज्ञानिक परिकल्पना को अप्रत्यक्ष पाठ्य आधार प्रदान करती है।

3. भू-आकृतिक अन्वेषण

Sutlej और Yamuna घाटियों के भूवैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक सर्वेक्षणों में wind gaps, परित्यक्त जलमार्ग तथा जलोढ़ सोपान चिह्नित किए गए हैं, जो नदी-अपहरण की घटनाओं के अनुरूप हैं। ये भू-आकृतिक संकेत स्पष्ट करते हैं कि इनमें से एक या दोनों नदियाँ कभी भिन्न मार्गों पर प्रवाहित होती थीं, जो Pleistocene विचलन परिकल्पना की पुष्टि करता है।

4. Robert Bruce Foote के अन्वेषण

Geological Survey of India के अग्रणी भूवैज्ञानिक Robert Bruce Foote ने प्रायद्वीपीय एवं उत्तरी भारत में क्षेत्र-कार्य किया। तथापि उनके प्रलेखित योगदान मुख्यतः Palaeolithic पुरातत्त्व पर केंद्रित थे, न कि Sutlej-Yamuna जल-विभाजन के व्यवस्थित अन्वेषण पर। अतः यह विकल्प उपर्युक्त साक्ष्यों में सबसे दुर्बल आधार प्रस्तुत करता है।

निष्कर्ष

पुरा-जलवैज्ञानिक पुनर्निर्माण जैविक, पाठ्य एवं भू-आकृतिक साक्ष्यों के समवर्ती उपयोग पर निर्भर करता है। भारत की प्राचीन अपवाह-विकास की सटीक समझ हेतु सुदृढ़ वैज्ञानिक साक्ष्यों को अनुमानित अथवा भ्रामक स्रोतों से पृथक करना अनिवार्य है।

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