WTO की स्थापना 1995 में GATT के उत्तराधिकारी के रूप में हुई और यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने वाला प्रमुख बहुपक्षीय ढाँचा है। इसकी सहमति-आधारित शासन प्रणाली और बाध्यकारी विवाद निपटान इसे अधिकांश अंतरराष्ट्रीय निकायों से अलग करते हैं।
GATT, जो 1948 से प्रचालन में था, एक अस्थायी समझौता था जिसमें स्थायी संस्थागत संरचना का अभाव था। Uruguay Round वार्ताओं की परिणति Marrakesh Agreement में हुई, जिसने जनवरी 1995 में WTO की औपचारिक स्थापना की। इसके अंतर्गत स्थायी सचिवालय, व्यापक अधिदेश तथा वस्तुओं, सेवाओं एवं बौद्धिक संपदा को समाहित करने वाली विधिक रूप से बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ निर्धारित की गईं।
WTO में निर्णय सामान्यतः सहमति से लिए जाते हैं, अर्थात कोई भी सदस्य प्रस्तावित निर्णय पर औपचारिक आपत्ति नहीं उठाता। यह संरचना विकासशील देशों सहित प्रत्येक सदस्य को औपचारिक भागीदारी देती है, किंतु Doha Development Round के दीर्घकालिक अवरोध से स्पष्ट है कि यह वार्ताओं को धीमा और गतिरोधग्रस्त भी बनाती है।
Dispute Settlement Body (DSB) पैनलों और Appellate Body के माध्यम से व्यापार विवादों का निर्णय करती है। DSB प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध नहीं लगाती; बल्कि वह पीड़ित सदस्य को उल्लंघनकर्ता पक्ष के विरुद्ध समतुल्य व्यापार रियायतें निलंबित करने का प्राधिकार देती है। इस प्रकार अनुपालन केंद्रीय प्रवर्तन के बजाय राज्य-संचालित रहता है।
नई नियुक्तियों को अवरुद्ध किए जाने के कारण Appellate Body 2019 से निष्क्रिय है, जिससे द्वि-स्तरीय विवाद प्रणाली कमज़ोर हुई है। साथ ही, बढ़ता एकपक्षवाद और WTO ढाँचे से बाहर के बहुपक्षीय समझौते वैश्विक व्यापार शासन में इसकी केंद्रीय भूमिका को चुनौती दे रहे हैं।
WTO को सुदृढ़ करने हेतु एक कार्यशील अपीलीय तंत्र की पुनर्स्थापना और सहमति नियमों में सुधार आवश्यक है, ताकि सदस्यों की संप्रभु समानता तथा प्रभावी वैश्विक व्यापार शासन के लिए अपेक्षित संस्थागत चपलता के मध्य उचित संतुलन स्थापित किया जा सके।
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