वृष्टि छाया प्रभाव एक मूलभूत पर्वतकृत (orographic) घटना है, जो महाद्वीपों में वर्षा वितरण को नियंत्रित करती है तथा पर्वत श्रेणियों के अनुवात (leeward) पक्ष पर पारिस्थितिकी, कृषि क्षमता एवं जल संसाधन उपलब्धता को आकार देती है।
जब आर्द्रता-युक्त पवनें किसी पर्वतीय अवरोध से टकराती हैं, तो वे वायुवर्धक (windward) ढाल पर ऊपर उठती हैं, रुद्धोष्म (adiabatic) प्रक्रिया से ठंडी होती हैं और वर्षा करती हैं। अनुवात ढाल पर उतरते समय शुष्क वायु गर्म होकर वर्षा को दबा देती है, जिससे वृष्टि छाया क्षेत्र निर्मित होता है। अतः वायुवर्धक पक्ष में अनुवात पक्ष की तुलना में अधिक वर्षा होती है।
Western Ghats अरब सागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों को अवरुद्ध कर पश्चिमी तटीय पट्टी पर भारी पर्वतकृत वर्षा कराते हैं। अनुवात पूर्वी भाग — दक्कन पठार — में वर्षा उल्लेखनीय रूप से कम होती है, जिससे यह वृष्टि छाया क्षेत्र बनता है। इससे महाराष्ट्र और Karnataka के आंतरिक जिलों की अर्ध-शुष्क दशाएँ, शुष्क भूमि कृषि और सिंचाई नियोजन प्रत्यक्षतः प्रभावित होते हैं।
Andes दक्षिणी दक्षिण अमेरिका में प्रशांत महासागर से आर्द्रता लाने वाली पछुआ पवनों के लिए एक सशक्त अवरोध का कार्य करते हैं। Chile की पश्चिमी ढलानों पर पर्याप्त वर्षा होती है, जबकि अनुवात पक्ष पर स्थित Argentina का पैटागोनियन क्षेत्र दक्षिणी गोलार्ध के सर्वाधिक शुष्क क्षेत्रों में से एक है — यह वृष्टि छाया मरुस्थल का आदर्श उदाहरण है।
वृष्टि छाया भूगोल की समझ सूखा-रोधी रणनीतियों, जलागम प्रबंधन और लक्षित सिंचाई योजनाओं के लिए अनिवार्य है। भारत के वृष्टि छाया क्षेत्रों में स्थित सूखा-प्रवण जिलों को राष्ट्रीय जल एवं कृषि नीति ढाँचों के अंतर्गत दीर्घकालिक जल अभाव की समस्या हेतु विशेष नीतिगत ध्यान की आवश्यकता रही है।
कथन 2 और 3 सही हैं; कथन 1 गलत है। पर्वतकृत वर्षा प्रतिरूपों की सटीक समझ, वृष्टि छाया क्षेत्रों में जल सुरक्षा, भू-उपयोग और जलवायु अनुकूलन हेतु प्रभावी स्थानिक नियोजन को सक्षम बनाती है।
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