सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक हानिकारक वायु प्रदूषकों में से एक है। जीवाश्म ईंधन दहन, विशेषतः विद्युत उत्पादन, इसका प्रमुख मानवजनित स्रोत है, जो अम्लीय वर्षा, श्वसन रोग और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण का कारण बनता है।
तापीय विद्युत संयंत्रों में सल्फरयुक्त कोयले के दहन से मानवजनित SO₂ उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। उच्च-सल्फर कोयले को flue-gas desulphurisation (FGD) तकनीक के बिना जलाने पर सघन SO₂ उत्सर्जन होता है। भारत में विद्युत क्षेत्र राष्ट्रीय SO₂ उत्पादन में असंगत रूप से बड़ी हिस्सेदारी रखता है, जिसे पर्यावरणीय अनुपालन समीक्षाओं में बार-बार रेखांकित किया गया है।
तांबा, जस्ता और सीसा जैसी अलौह धातुओं का प्रगलन, पेट्रोलियम शोधन तथा सीमेंट उत्पादन द्वितीयक औद्योगिक स्रोत हैं। समुद्री परिवहन और डीजल वाहन भी SO₂ उत्सर्जन में योगदान करते हैं, विशेषतः तटीय और नगरीय क्षेत्रों में जहाँ भारी ईंधन तेल का दहन प्रचलित है।
SO₂ वायुमंडल में सल्फेट एरोसोल और सल्फ्यूरिक अम्ल में परिवर्तित होकर अम्लीय वर्षा उत्पन्न करती है, जिससे वन, मीठे जल निकाय और धरोहर संरचनाएँ क्षतिग्रस्त होती हैं। महामारी विज्ञान के साक्ष्य SO₂ संपर्क को दमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय-संबंधी तनाव से जोड़ते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर आर्थिक बोझ डालता है।
भारत का Environment (Protection) Act तापीय विद्युत संयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानक निर्धारित करता है और विद्यमान इकाइयों में FGD रेट्रोफिटिंग अनिवार्य की गई है। वैश्विक स्तर पर समुद्री ईंधन पर सल्फर सीमा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण SO₂ भार को कम कर रहे हैं, किंतु प्रवर्तन की कमियाँ और पूंजीगत बाधाएँ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अनुपालन को धीमा करती हैं।
विद्युत क्षेत्र का विकार्बनीकरण और FGD अधिदेशों का कड़ा प्रवर्तन SO₂ प्रदूषण न्यूनीकरण के सर्वाधिक प्रत्यक्ष उपाय हैं। ऊर्जा सुरक्षा और उत्सर्जन अनुपालन के मध्य संतुलन के लिए समयबद्ध नियामक ढाँचे, विश्वसनीय निगरानी तंत्र और वित्तीय सहायता प्रणाली अनिवार्य हैं।
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