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Biodiversity / Insects — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Environment · UPSC CSE
प्रश्न: कीटों का पारिस्थितिक महत्व — भूमिकाएँ, खतरे और संरक्षण की अनिवार्यताएँ

प्रस्तावना

कीट समस्त ज्ञात प्रजातियों में आधे से अधिक हैं और परागण, अपघटन तथा खाद्य-श्रृंखला समर्थन के माध्यम से लगभग प्रत्येक स्थलीय एवं मीठे जल के पारितंत्र को आधार प्रदान करते हैं, जिससे उनका संरक्षण एक शासन-प्राथमिकता बन जाता है।

मुख्य बिंदु

1. पारिस्थितिक भूमिकाएँ एवं कार्यात्मक विविधता

सिकाडा (ध्वनि उत्पन्न करने वाले शाकाहारी कीट जो निम्फ अवस्था में मृदा को वातित करते हैं), froghoppers (रस-भक्षी कीट जो सुरक्षात्मक झागीय आवरण बनाते हैं) और pond skaters (मीठे जल में पृष्ठ-तनाव का उपयोग करने वाले परभक्षी) — ये सभी कीटों की पारिस्थितिक विविधता को दर्शाते हैं। प्रत्येक प्रजाति पोषक-चक्रण, शिकार-नियमन और ऊर्जा-स्थानांतरण जैसे विशिष्ट कार्य करती है।

2. पर्यावरणीय स्वास्थ्य के संकेतक

pond skaters जैसे जलीय कीट मीठे जल की गुणवत्ता के जैव-संकेतक के रूप में कार्य करते हैं; उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति प्रदूषण स्तर एवं जलीय अखंडता को इंगित करती है। ऐसी संकेतक प्रजातियों की निगरानी, आर्द्रभूमि और नदी प्रबंधन से संबंधित नियामक ढाँचे के अंतर्गत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन हेतु किफायती एवं क्षेत्र-उपयोगी डेटा प्रदान करती है।

3. कीट-पतन को गति देने वाले खतरे

आवास-विखंडन, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्रकाश प्रदूषण और जलवायु-जनित फेनोलॉजिकल असंतुलन वैश्विक स्तर पर कीट-जनसंख्या में तीव्र गिरावट ला रहे हैं। यह 'insect apocalypse' खाद्य सुरक्षा को प्रत्यक्ष रूप से — फसल परागण पर निर्भरता के कारण — और अप्रत्यक्ष रूप से पक्षियों व उभयचरों की जनसंख्या के पतन के माध्यम से संकट में डालता है।

4. नीतिगत एवं शासन-स्तरीय प्रतिक्रिया

भारत का Biological Diversity Act और National Biodiversity Action Plan कीट-संरक्षण हेतु एक ढाँचा प्रदान करते हैं, किंतु सीमित वर्गिकी विशेषज्ञता और अपर्याप्त निगरानी अवसंरचना के कारण क्रियान्वयन दुर्बल बना हुआ है। neonicotinoid कीटनाशकों के विनियमन और एकीकृत कीट प्रबंधन को कृषि नीति में समाहित करना गिरावट को पलटने के लिए अनिवार्य है।

निष्कर्ष

कीट पारितंत्र सेवाओं के मूलाधार हैं, फिर भी संरक्षण नीति में उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। जैव विविधता विधान और भूमि-स्तरीय क्रियान्वयन के मध्य की खाई को नागरिक-विज्ञान निगरानी के सहयोग से पाटना तत्काल प्रशासनिक आवश्यकता है।

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