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Biotechnology — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Environment · UPSC CSE
प्रश्न: Nagoya Protocol — आनुवंशिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के लिए Access and Benefit-Sharing ढाँचा, जैव विविधता शासन के संदर्भ में

प्रस्तावना

Convention on Biological Diversity के अंतर्गत अपनाया गया Nagoya Protocol, आनुवंशिक संसाधनों से उत्पन्न लाभों के न्यायसंगत वितरण को क्रियान्वित करता है — यह जैव विविधता-समृद्ध राष्ट्रों के संप्रभु अधिकारों और वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी उद्योगों की माँगों के मध्य संतुलन स्थापित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय उपकरण है।

मुख्य बिंदु

1. Access and Benefit-Sharing (ABS) ढाँचा

यह Protocol कानूनी रूप से बाध्यकारी दायित्व स्थापित करता है, जिसके अंतर्गत आनुवंशिक संसाधनों के उपयोगकर्ताओं को प्रदाता देशों के साथ मौद्रिक अथवा गैर-मौद्रिक लाभ साझा करने होते हैं। यह 'biopiracy' की समस्या को सीधे संबोधित करता है, जिसमें वाणिज्यिक संस्थाएँ स्रोत राष्ट्रों या समुदायों को क्षतिपूर्ति दिए बिना जैविक संपदा का दोहन करती हैं।

2. Prior Informed Consent (PIC) की अनिवार्यता

आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच से पूर्व उपयोगकर्ताओं को प्रदाता देश की सक्षम राष्ट्रीय प्राधिकरण से Prior Informed Consent प्राप्त करना अनिवार्य है। यह प्रावधान संप्रभु राष्ट्रों को पहुँच को विनियमित करने का अधिकार देता है, जिससे जैव विविधता का दोहन न तो एकपक्षीय हो और न ही गोपनीय।

3. पारंपरिक ज्ञान का समावेश

एक सामान्य भ्रांति के विपरीत, यह Protocol स्पष्ट रूप से अपने दायरे को स्वदेशी एवं स्थानीय समुदायों के पास विद्यमान आनुवंशिक संसाधनों से संबद्ध पारंपरिक ज्ञान तक विस्तारित करता है। यह समावेश इस तथ्य को मान्यता देता है कि ऐसा ज्ञान प्रायः वाणिज्यिक bioprospecting का मार्गदर्शन करता है और इसे समुचित संरक्षण एवं लाभ-साझाकरण का अधिकार है।

4. भारत द्वारा क्रियान्वयन

एक megadiverse देश के रूप में भारत, Biological Diversity Act और National Biodiversity Authority के माध्यम से ABS दायित्वों को क्रियान्वित करता है। लाभ-साझाकरण समझौते और People's Biodiversity Registers सामुदायिक स्तर की आनुवंशिक विरासत को दस्तावेजीकृत एवं संरक्षित करने का प्रयास करते हैं, यद्यपि प्रवर्तन में अंतराल बना हुआ है।

निष्कर्ष

Nagoya Protocol के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सुदृढ़ राष्ट्रीय विधान, संस्थागत क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय अनुपालन तंत्र अपेक्षित हैं। संधि-दायित्वों और जमीनी स्तर पर प्रवर्तन के मध्य की खाई को पाटना, जैव विविधता-समृद्ध विकासशील राष्ट्रों के समक्ष प्रमुख शासन-चुनौती बनी हुई है।

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