Paris Agreement के तहत प्रस्तुत भारत के अद्यतन NDC, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी जलवायु संकल्पों में से एक हैं, जो विकासात्मक आवश्यकताओं और 2030 के विश्वसनीय विकार्बनीकरण लक्ष्यों के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं।
भारत के अद्यतन NDC में 2030 तक स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य है। इसके साथ ही 2005 के स्तर की तुलना में GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी का संकल्प है। भारत का दीर्घकालिक net-zero लक्ष्य 2040 नहीं, बल्कि 2070 निर्धारित है।
500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य NDC की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है। सौर मॉड्यूल हेतु Production Linked Incentive, National Green Hydrogen Mission तथा पवन ऊर्जा नीलामी के विस्तार से यह संक्रमण क्रियान्वित हो रहा है। ग्रिड एकीकरण और भंडारण अवसंरचना प्रमुख अवरोध बने हुए हैं।
भारत का दृष्टिकोण पूर्ण कटौती के स्थान पर उत्सर्जन तीव्रता को लक्ष्य का आधार बनाता है, जो न्यायसंगत विकास के अधिकार को प्रतिबिंबित करता है। यह ढाँचा GDP वृद्धि के साथ-साथ कार्बन उत्पादन को क्रमशः पृथक करने की अनुमति देता है, किंतु इसके लिए सुदृढ़ GDP-आधारित निगरानी तंत्र अनिवार्य है।
NDC लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु 2030 तक सैकड़ों अरब डॉलर के जलवायु वित्त की आवश्यकता अनुमानित है। Paris Agreement की वित्त संरचना के अंतर्गत विकसित देशों की प्रतिबद्धताएँ अपर्याप्त बनी हुई हैं, जिससे भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए कार्यान्वयन जोखिम उत्पन्न होता है।
भारत का NDC विकास की समानता और जलवायु उत्तरदायित्व के मध्य एक सुविचारित संतुलन को दर्शाता है। सुसंगत घरेलू नीति-निर्माण तथा अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त दायित्वों की पूर्ति ही यह निर्धारित करेगी कि ये प्रतिबद्धताएँ 2030 तक मापनीय परिणामों में परिवर्तित हो सकेंगी या नहीं।
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