वेट-बल्ब तापमान (WBT) ताप और आर्द्रता का वह संयुक्त मापक है, जिसके परे मानव शरीर पसीने द्वारा स्वयं को शीतल नहीं कर सकता। 35°C WBT एक शारीरिक अस्तित्व-सीमा है, जिसके गंभीर शासन-प्रशासनिक निहितार्थ भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।
मानव शरीर मुख्यतः पसीने के वाष्पीकरण द्वारा अपना मूल तापमान नियंत्रित करता है। जब परिवेशी WBT 35°C तक पहुँचती है, तो पसीने की मात्रा चाहे जितनी हो, वाष्पीकरण रुक जाता है और कुछ घंटों में मूल तापमान घातक स्तर तक बढ़ जाता है। यह सीमा पशुधन एवं वन्यजीवों के लिए भी उतनी ही संहारक है, जिससे खाद्य सुरक्षा और जैव-विविधता को खतरा उत्पन्न होता है।
Indo-Gangetic Plain और तटीय आर्द्र क्षेत्र बढ़ते तापमान एवं उच्च सापेक्ष आर्द्रता के संयोजन के कारण सर्वाधिक WBT जोखिम में हैं। कृषि श्रमिक, निर्माण कार्यकर्ता और पथ-विक्रेता जैसे व्यावसायिक वर्ग असंगत रूप से अधिक प्रभावित होते हैं, जिससे विद्यमान सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और गहरी होती हैं।
बाढ़, चक्रवात और सूखा व्यापक जलवायु परिवर्तन के परिणाम हैं, न कि विशेष रूप से वेट-बल्ब तापमान की अधिकता के। कथन I विभिन्न जलवायु-संकटों को एकसाथ मिला देता है; WBT चेतावनी विशेष रूप से ताप-आर्द्रता की घातकता को संबोधित करती है, न कि वर्षण या तूफान के स्वरूपों को।
भारत की Heat Action Plans, जो वर्तमान में चुनिंदा नगरों में क्रियान्वित हैं, को जिला एवं पंचायत स्तर तक विस्तारित करना आवश्यक है। शीतल-छत कार्यक्रमों, छायादार सार्वजनिक स्थलों और बाहरी श्रमिकों हेतु संशोधित व्यावसायिक सुरक्षा मानकों के माध्यम से शहरी ताप-द्वीप प्रभाव को कम करना तात्कालिक प्रशासनिक प्राथमिकता है।
केवल कथन II ही WBT चेतावनी के निहितार्थ को सटीक रूप से प्रतिबिंबित करता है। इस खतरे से निपटने के लिए ताप-तनाव मापकों को आपदा जोखिम ढाँचों, श्रम विनियमों और नगर-नियोजन में समेकित करना अपरिहार्य है — अत्यधिक गर्मी को प्रथम-श्रेणी की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में मान्यता देते हुए।
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