भारत का Water-Energy-Food nexus एक संरचनात्मक शासन-चुनौती है, जिसमें साझा प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय माँगें खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा विश्वसनीयता और पारिस्थितिक स्थिरता को एक साथ संकट में डालती हैं।
भारतीय कृषि कुल मीठे जल के लगभग 80% का उपभोग करती है, फिर भी GDP में इसका योगदान इस संसाधन-गहनता के अनुपात में अत्यल्प है। बाढ़-सिंचाई पद्धतियाँ, भूजल पम्पिंग हेतु सब्सिडीयुक्त विद्युत, और धान जैसी जल-गहन फसलों का प्रतिरूप इस अकुशलता को बनाए रखता है। WEF nexus की चुनौती यह है कि खाद्य सुरक्षा और कृषक आजीविका को क्षति पहुँचाए बिना कृषि जल-उपयोग में सुधार कैसे किया जाए।
भारत के विद्युत मिश्रण में प्रमुख भूमिका निभाने वाले ताप विद्युत संयंत्रों को शीतलन हेतु पर्याप्त मीठे जल की आवश्यकता होती है। साथ ही, सिंचाई के लिए भूजल निष्कर्षण विद्युत पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे एक ऐसा प्रतिक्रिया-चक्र बनता है जिसमें ऊर्जा सब्सिडी जलभृत-ह्रास को त्वरित करती है। किसी एक क्षेत्र को पृथक रूप से संबोधित करने वाली नीतियाँ दूसरे क्षेत्र में संकट को और गहरा कर सकती हैं।
भूजल-ह्रास WEF nexus का सबसे तीव्र संगम-बिंदु है — यह एक साथ सिंचाई क्षमता, औद्योगिक शीतलन हेतु जल-उपलब्धता और पेयजल सुरक्षा को कमज़ोर करता है। Atal Bhujal Yojana सामुदायिक स्तर पर भूजल प्रबंधन का प्रयास करती है, किंतु राज्यों में इसका कार्यान्वयन असमान बना हुआ है।
जल, ऊर्जा और खाद्य का प्रशासन पृथक मंत्रालयों द्वारा किया जाता है, जिनकी प्रोत्साहन-संरचनाएँ परस्पर असंरेखित हैं। एकीकृत बेसिन-स्तरीय नियोजन, अंतर-क्षेत्रीय डेटा-साझाकरण और एकीकृत संसाधन-मूल्य निर्धारण जैसी संस्थागत कमियाँ सुसंगत nexus शासन को बाधित करती हैं।
भारत के WEF nexus के समाधान हेतु संस्थागत अभिसरण अनिवार्य है — मूल्य-निर्धारण, सब्सिडी और नियामक ढाँचों को क्षेत्रों में संरेखित करना होगा। क्रमिक क्षेत्रीय उपाय अपर्याप्त सिद्ध होंगे; केवल एकीकृत संसाधन-शासन ही प्रतिस्पर्धी माँगों को संतुलित कर सकता है।
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