पश्चिमी Hoolock Gibbon, भारत की एकमात्र वानर प्रजाति, उत्तर-पूर्व भारत के वर्षावनों में एक महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक स्थान रखती है। IUCN Red List पर इसकी 'Endangered' स्थिति तत्काल संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
पश्चिमी Hoolock Gibbon मुख्यतः Assam, Meghalaya, Manipur और Mizoram के वनों में पाई जाती है। Assam स्थित Gibbon Wildlife Sanctuary इसके लिए समर्पित आश्रय-स्थल है। तथापि, संरक्षित क्षेत्रों के बाहर खंडित वन-पट्टियों में रहने वाली जनसंख्या आवास-क्षरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनी हुई है।
गोरिल्ला के विपरीत, Hoolock Gibbon की काया दुबली-पतली होती है, जो brachiation — अर्थात् वृक्ष-शाखाओं के मध्य भुजाओं से झूलने — के लिए विशेष रूप से अनुकूलित है। इस गति-प्रणाली हेतु निरंतर वन-आच्छादन अनिवार्य है; वृक्ष-छत्र में कोई भी अंतराल समूहों को पृथक कर遗传 प्रवाह एवं सामाजिक संरचना को बाधित करता है।
झूम खेती, अवसंरचना विस्तार एवं अवैध लकड़ी-कटाई से उत्पन्न वन-विनाश प्राथमिक खतरा है। वन्यमांस हेतु शिकार तथा जीवित पशु-व्यापार जनसंख्या ह्रास को और गहरा करते हैं। प्रजाति की निम्न प्रजनन दर — सामान्यतः प्रति दो से तीन वर्ष में एक संतान — जनसंख्या पुनर्प्राप्ति को अत्यंत मंद बनाती है।
समुदाय-आधारित वन प्रबंधन, सड़कों पर canopy bridge की स्थापना तथा आवास-गलियारों की पुनर्स्थापना प्रभावी उपकरण सिद्ध हुए हैं। राज्य वन्यजीव कार्ययोजनाओं में Gibbon संरक्षण को एकीकृत करना एवं Wildlife Protection Act के अंतर्गत प्रवर्तन को सुदृढ़ करना प्रशासनिक प्राथमिकताएँ हैं।
पश्चिमी Hoolock Gibbon की जनसंख्या को बनाए रखने के लिए संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन एवं सामुदायिक आजीविका को जोड़ने वाली भू-दृश्य-स्तरीय सोच अपरिहार्य है। गलियारा-संयोजकता और स्थानीय प्रबंधकीय भागीदारी, सशक्त विधिक प्रवर्तन के साथ मिलकर, इस प्रजाति के भविष्य को निर्धारित करेगी।
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