बौद्ध संगीतियाँ बौद्ध धर्म के इतिहास में निर्णायक संस्थागत अवसर थीं, जिन्होंने सिद्धांत-संकलन, ग्रंथ-संरक्षण और अंततः सांप्रदायिक विभाजनों को स्वरूप प्रदान किया — जिसने इस धर्म की वैश्विक दिशा निर्धारित की।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तत्काल पश्चात् राजा Ajatashatru के संरक्षण में Rajagriha में आयोजित इस संगीति का उद्देश्य बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन एवं संरक्षण करना था। Upali ने Vinaya (मठीय नियम) तथा Ananda ने Dhamma (सैद्धांतिक प्रवचन) का वाचन किया, जिससे मूल कैनोनिकल ग्रंथ-संग्रह की नींव पड़ी।
लगभग एक शताब्दी पश्चात् Vaishali में आयोजित इस संगीति में मठीय अनुशासन, विशेषतः Vajjian भिक्षुओं द्वारा अपनाए गए शिथिल आचरण के 'दस बिंदुओं' पर विवाद उत्पन्न हुआ। इस संगीति के मतभेदों ने अंततः Mahasanghika और Sthaviravada संप्रदायों के उद्भव में योगदान दिया, जो बौद्ध धर्म का प्रथम प्रमुख संस्थागत विभाजन था।
सम्राट Ashoka के संरक्षण में Pataliputra में आयोजित तृतीय संगीति का केंद्र-बिंदु संघ को विधर्मी तत्त्वों से शुद्ध करना तथा Pali Canon को अंतिम रूप देना था। इसके साथ ही धर्म-प्रचार अभियान प्रेषित किए गए, जिनमें Mahinda का श्रीलंका मिशन प्रमुख था, जिसने बौद्ध धर्म के भौगोलिक विस्तार को महत्त्वपूर्ण गति प्रदान की।
Kushana सम्राट Kanishka के तत्त्वावधान में आयोजित चतुर्थ संगीति Pataliputra में नहीं, अपितु Kashmir में हुई। इसमें Abhidharma पर प्रामाणिक भाष्य तैयार किए गए और यह Mahayana बौद्ध धर्म के औपचारिक सुदृढ़ीकरण से संबद्ध है, जो प्रारंभिक Theravada परंपराओं से एक सैद्धांतिक विचलन को चिह्नित करता है।
बौद्ध संगीतियाँ यह प्रदर्शित करती हैं कि संस्थागत सभाएँ किसी परंपरा का संरक्षण भी कर सकती हैं और उसके आंतरिक विविधीकरण को भी जन्म दे सकती हैं। उनकी विरासत — कैनोनिकल ग्रंथ, धर्म-प्रचार नेटवर्क और सांप्रदायिक विद्यालय — वैश्विक बौद्ध धर्म में निहित बहुलवाद को आज भी परिभाषित करती है।
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