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Ancient India — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

History · UPSC CSE
प्रश्न: सिंधु घाटी सभ्यता की नगर-योजना, भौतिक संस्कृति एवं व्यापार अवसंरचना

प्रस्तावना

सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 BCE) प्राचीन विश्व की सर्वाधिक परिष्कृत नगरीय संस्कृतियों में से एक है, जो मानकीकृत नगर-योजना, उन्नत जल-अभियांत्रिकी तथा सुदूर समुद्री व्यापार-तंत्र के लिए विशिष्ट रूप से पहचानी जाती है।

मुख्य बिंदु

1. Mohenjo-daro की जल-अभियांत्रिकी

महाकुंड (Great Bath) सार्वजनिक जलरोधी अवसंरचना के प्राचीनतम उदाहरणों में से एक है। इसका निर्माण जिप्सम मोर्टार से जुड़ी पकी ईंटों द्वारा किया गया था तथा जलरोधन सुनिश्चित करने हेतु ईंट-परतों के मध्य बिटुमेन की परत लगाई गई थी। यह अभियांत्रिकी परिशुद्धता तकनीकी दक्षता एवं सुसंगठित नागरिक प्रशासन दोनों का संकेत देती है।

2. 'अन्नागारों' पर विद्वत्-विवाद

Harappa एवं Mohenjo-daro में पाई गई संरचनाओं को उनके आकार और वायु-संचार सुविधाओं के आधार पर प्रारंभ में अन्नागार कहा गया। किंतु पुरावनस्पति-वैज्ञानिक (archaeobotanical) साक्ष्य इनके अनाज-भंडारण के प्राथमिक उपयोग की पुष्टि नहीं करते; कुछ विद्वान इन्हें सभागार अथवा गोदाम के रूप में व्याख्यायित करते हैं। यह पहचान समकालीन पुरातात्त्विक साहित्य में अभी भी विवादास्पद बनी हुई है।

3. Lothal का गोदी-बाड़ा एवं समुद्री व्यापार

वर्तमान Gujarat में स्थित Lothal में एक ईंट-निर्मित जलाशय था, जिसे व्यापक रूप से गोदी-बाड़ा (dockyard) माना जाता है और जो Sabarmati नदी-तंत्र की एक प्राचीन धारा से जुड़ा था। Lothal में Persian Gulf की मुहरों तथा मानकीकृत बाटों की प्राप्ति, Mesopotamia एवं अरब तट के साथ सक्रिय समुद्री और स्थलीय व्यापार की पुष्टि करती है।

4. नगर-योजना के शासन-संबंधी निहितार्थ

भौगोलिक दृष्टि से बिखरे हुए स्थलों पर ईंटों के आकार की एकरूपता, ग्रिड-पैटर्न सड़कें और केंद्रीकृत जल-निकासी व्यवस्था एक ऐसे प्रशासनिक समन्वय का संकेत देती है, जिसकी व्याख्या अभी तक अपठित लिपि के अभाव में संभव नहीं हो सकी है। यह शासन-प्रतिमान मानकीकरण एवं सार्वजनिक उपयोगिता प्रबंधन की दृष्टि से समकालीन नगरीय अवसंरचना-नियोजन हेतु प्रासंगिक सबक प्रस्तुत करता है।

निष्कर्ष

सिंधु सभ्यता की भौतिक संस्कृति एक ऐसे समाज को प्रकट करती है जिसने स्मारकीय प्रदर्शन के स्थान पर नागरिक व्यवस्था एवं संपर्कता को प्राथमिकता दी। पुरातत्त्व, पुरावनस्पति-विज्ञान तथा सुदूर-संवेदन को समेकित करने वाला अंतःविषयक अनुसंधान इस सभ्यता से जुड़े व्याख्यात्मक रिक्तियों को दूर करने के लिए अनिवार्य है।

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