राजकोषीय अनुशासन समष्टि-आर्थिक स्थिरता का आधार है। FRBM Act, 2003 ने भारत में नियम-आधारित राजकोषीय प्रबंधन को संस्थागत रूप दिया तथा केंद्र सरकार को पारदर्शी एवं समयबद्ध घाटा-न्यूनीकरण लक्ष्यों से आबद्ध किया।
FRBM Act के अंतर्गत केंद्र सरकार को GDP के अनुपात में राजकोषीय घाटे, राजस्व घाटे और बकाया देनदारियों को क्रमशः कम करना अनिवार्य है। यह अधिनियम वार्षिक Medium-Term Fiscal Policy Statement तथा Fiscal Policy Strategy Statement को संसद के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश देता है, जिससे बजटीय प्रतिबद्धताओं पर विधायी निगरानी सुनिश्चित होती है।
यह अधिनियम आकस्मिक देनदारियों को नियंत्रित करने हेतु सरकारी गारंटियों पर एक सीमा निर्धारित करता है। यह प्रावधान ऑफ-बजट जोखिम को सरकार की समेकित राजकोषीय स्थिति को कमज़ोर करने से रोकने के लिए बनाया गया है, यद्यपि सटीक सीमा अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियमों पर निर्भर करती है।
N.K. Singh की अध्यक्षता में गठित FRBM Review Committee ने एकल-बिंदु राजकोषीय घाटा लक्ष्य के स्थान पर Fiscal Deficit Range अपनाने की अनुशंसा की, जिससे प्रति-चक्रीय लचीलापन संभव हो सके। समिति ने राजकोषीय अनुमानों और अनुपालन के निष्पक्ष मूल्यांकन हेतु एक स्वतंत्र Fiscal Council की स्थापना का भी प्रस्ताव रखा।
यह अधिनियम राष्ट्रीय आपदा, संरचनात्मक सुधारों अथवा GDP में तीव्र गिरावट की स्थिति में लक्ष्यों से विचलन की अनुमति देने वाले विशिष्ट escape clauses प्रदान करता है। तथापि ये परिभाषित परिस्थितियाँ हैं; यह अधिनियम राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान वित्त मंत्रालय को संसदीय रिपोर्टिंग दायित्वों से व्यापक रूप से मुक्त नहीं करता।
प्रभावी राजकोषीय समेकन के लिए नियम-आधारित अनुशासन और प्रति-चक्रीय लचीलेपन के मध्य संतुलन आवश्यक है। स्वतंत्र Fiscal Council की स्थापना और escape clause के पारदर्शी ट्रिगर — ये संस्थागत सुदृढ़ीकरण FRBM की विश्वसनीयता और दीर्घकालिक समष्टि-आर्थिक स्थिरता के लिए अपरिहार्य हैं।
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