पूंजी बाजार, बचत को उत्पादक निवेश में रूपांतरित करने के लिए मुख्यतः दो साधनों — बॉन्ड और स्टॉक — का उपयोग करता है, जो अपने विधिक स्वरूप, जोखिम-प्रोफाइल और कॉर्पोरेट परिसंपत्तियों पर दावे की दृष्टि से मूलभूत रूप से भिन्न हैं।
बॉन्डधारक एक लेनदार की भूमिका में होते हैं, जो संविदात्मक दायित्व के अंतर्गत कंपनी को पूंजी उधार देते हैं; कंपनी को लाभप्रदता की स्थिति चाहे जो हो, मूलधन और आवधिक ब्याज का भुगतान अनिवार्य है। इसके विपरीत, स्टॉकधारक अवशिष्ट स्वामी होते हैं, जो लाभांश के माध्यम से लाभ में भागीदार होते हैं और उद्यम का पूर्ण उद्यमशीलता जोखिम वहन करते हैं।
बॉन्डधारकों को संविदात्मक रूप से निश्चित प्रतिफल प्राप्त होता है, इसलिए उनकी आय अधिक पूर्वानुमेय और व्यावसायिक उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होती है। स्टॉकधारकों को परिवर्तनशील प्रतिफल मिलता है — लाभकारी अवधि में यह अधिक हो सकता है, किंतु मंदी के दौर में पूर्ण हानि की संभावना भी रहती है — जिससे इक्विटी, ऋण की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक जोखिमपूर्ण होती है।
दिवालियेपन या परिसमापन की स्थिति में विधिक क्रम के अनुसार सर्वप्रथम सुरक्षित लेनदारों को, तत्पश्चात असुरक्षित बॉन्डधारकों को और अंत में अवशिष्ट इक्विटी धारकों को भुगतान किया जाता है। दावे की यह वरिष्ठता ही वह मूल कारण है जिससे बॉन्डधारक स्टॉकधारकों की तुलना में कम अपेक्षित प्रतिफल स्वीकार करते हैं।
भारत के वित्तीय क्षेत्र विकास एजेंडे में परिकल्पित एक सुदृढ़ कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार, फर्मों को बैंक ऋण से परे वित्तपोषण विविधीकरण का अवसर देता है और निवेशकों को कम जोखिम वाली परिसंपत्ति श्रेणी उपलब्ध कराता है। इस बाजार को गहरा करने से इक्विटी वित्तपोषण पर प्रणालीगत निर्भरता घटती है और खुदरा निवेशकों की निश्चित-आय साधनों में भागीदारी बढ़ती है।
तीनों कथन सही और परस्पर पूरक हैं: बॉन्डधारकों का कम जोखिम प्रत्यक्षतः उनकी लेनदार स्थिति और पुनर्भुगतान की प्राथमिकता से उद्भूत होता है। इस क्रम के प्रति निवेशक जागरूकता को सुदृढ़ करना परिपक्व पूंजी बाजार के विकास के लिए आवश्यक है।
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