प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन दर (Replacement Level Fertility) को सामान्यतः Total Fertility Rate 2.1 पर निर्धारित किया जाता है, जो वह सीमा है जिस पर कोई जनसंख्या प्रवासन की सहायता के बिना पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना अस्तित्व बनाए रखती है।
यह मान बाल मृत्यु दर और जन्म के समय के प्राकृतिक लिंगानुपात को ध्यान में रखता है, जो पुरुष जन्म की ओर थोड़ा झुका होता है। 0.1 का यह अतिरिक्त अंश सुनिश्चित करता है कि पर्याप्त संख्या में महिलाएँ प्रजनन आयु तक जीवित रहें और दोनों माता-पिता का प्रतिस्थापन कर सकें, जिससे पीढ़ीगत निरंतरता बनी रहे।
National Family Health Survey के आँकड़े दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय TFR लगभग 2.0 तक गिर चुका है, अर्थात देश समग्र रूप से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गया है। तथापि, राज्यों के बीच उल्लेखनीय असमानता विद्यमान है — कुछ उच्च-प्रजनन दर वाले राज्य अभी भी 2.1 से ऊपर हैं, जबकि दक्षिणी राज्य इससे काफी नीचे हैं।
जब TFR दीर्घकालिक रूप से 2.1 से नीचे रहता है, तो जनसंख्या अंततः सिकुड़ने और वृद्ध होने लगती है, जिससे पेंशन प्रणाली, स्वास्थ्य अवसंरचना और श्रम आपूर्ति पर दबाव पड़ता है। Japan और South Korea जैसे देश यह प्रदर्शित करते हैं कि प्रतिस्थापन-स्तर से नीचे की प्रजनन दर किस प्रकार कार्यशील आयु वर्ग को संकुचित कर सामाजिक सुरक्षा ढाँचे पर वित्तीय दबाव उत्पन्न करती है।
भारत को दो समवर्ती चुनौतियों का सामना करना है: उच्च TFR वाले क्षेत्रों में महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और स्वैच्छिक परिवार नियोजन में निवेश के माध्यम से प्रजनन दर में तीव्र गिरावट लाना, और साथ ही उन राज्यों के लिए संस्थागत ढाँचा तैयार करना जो पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा चुके हैं।
प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन दर कोई स्थिर नीतिगत लक्ष्य नहीं, बल्कि एक निदानात्मक मानक है। भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश तभी साकार होगा जब प्रजनन संक्रमण के साथ-साथ मानव पूँजी में निवेश हो, ताकि संख्यात्मक लाभ को दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता में परिवर्तित किया जा सके।
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