सरकारी प्रतिभूतियाँ भारत के संप्रभु ऋण बाज़ार की आधारशिला हैं, जो केंद्र और राज्यों को राजकोषीय घाटे की पूर्ति हेतु सक्षम बनाती हैं तथा व्यापक वित्तीय प्रणाली को स्थिरता प्रदान करने वाले जोखिम-मुक्त साधनों के रूप में कार्य करती हैं।
T-Bills केंद्र सरकार द्वारा 91, 182 और 364 दिनों की परिपक्वता के लिए जारी किए जाने वाले शून्य-कूपन साधन हैं। इन्हें बट्टे पर जारी कर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है, जिससे ये अल्पकालिक जोखिम-मुक्त दरों के मानक बन जाते हैं। Reserve Bank of India सरकार की ओर से साप्ताहिक नीलामी संचालित करता है।
CMBs को सरकारी नकदी प्रवाह में अस्थायी असंतुलन दूर करने हेतु प्रारंभ किया गया था और इनकी परिपक्वता 91 दिनों से कम होती है। नियमित T-Bills के विपरीत, ये अमानक होते हैं तथा सरकार की अल्पकालिक तरलता आवश्यकता के अनुसार तदर्थ आधार पर जारी किए जाते हैं। इनका लचीला कार्यकाल इन्हें मानकीकृत T-Bill कैलेंडर से पृथक करता है।
SDLs राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे की पूर्ति हेतु जारी की जाने वाली दिनांकित प्रतिभूतियाँ हैं, जिनकी अवधि सामान्यतः दस वर्ष होती है। RBI इनके निर्गम का प्रबंधन करता है, किंतु इन पर केंद्र सरकार की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं होती। ये केंद्रीय प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक प्रतिफल पर कारोबार करती हैं, जो उप-संप्रभु ऋण जोखिम को दर्शाता है।
G-Secs सामूहिक रूप से सरकारी बाज़ार उधारी के प्राथमिक माध्यम के रूप में कार्य करती हैं, मानक प्रतिफल निर्धारित करती हैं और बैंकिंग तथा मौद्रिक परिचालनों के लिए उच्च-गुणवत्ता संपार्श्विक प्रदान करती हैं। Retail Direct Scheme ने इन साधनों तक संस्थागत निवेशकों से परे आम निवेशकों की पहुँच बढ़ाकर बाज़ार को गहरा किया है।
सुदृढ़ G-Sec बाज़ार कुशल सार्वजनिक ऋण प्रबंधन और मौद्रिक संचरण के लिए अपरिहार्य है। तरलता विस्तार, निवेशक आधार का विस्तार और SDL की विश्वसनीयता बनाए रखना टिकाऊ राजकोषीय वित्तपोषण की दृष्टि से प्राथमिक लक्ष्य हैं।
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