Crowding Out Effect यह वर्णित करता है कि किस प्रकार विस्तारवादी राजकोषीय नीति, विशेषतः घाटे से वित्तपोषित सरकारी उधारी, ब्याज दरें बढ़ाकर निजी निवेश को संकुचित कर देती है और इस प्रकार अभीष्ट प्रोत्साहन को आंशिक रूप से निष्प्रभावी कर देती है।
जब सरकार राजकोषीय घाटे की पूर्ति हेतु घरेलू वित्तीय बाज़ारों से भारी उधारी करती है, तो वह निजी उधारकर्ताओं के साथ उपलब्ध ऋण-योग्य निधियों के लिए प्रतिस्पर्धा करती है। ऋण की इस बढ़ी हुई माँग से ब्याज दरें ऊँची हो जाती हैं, जिससे निजी फर्मों और परिवारों के लिए उधारी महँगी पड़ती है और निजी पूँजी-निर्माण बाधित होता है।
Crowding Out Effect, Fiscal Multiplier को प्रत्यक्ष रूप से कमज़ोर करता है — अर्थात् सरकारी व्यय की एक इकाई से कुल उत्पाद में होने वाली वृद्धि घट जाती है। उथले वित्तीय बाज़ारों या उच्च राजकोषीय घाटे वाली अर्थव्यवस्थाओं में multiplier एक से काफी नीचे आ सकता है, जिसका अर्थ है कि सरकारी व्यय निजी गतिविधि का पूरक बनने के बजाय उसका प्रतिस्थापन करने लगता है।
पूर्ण Crowding Out, जिसमें निजी निवेश ठीक उतना ही घटता है जितना सरकारी व्यय बढ़ता है, एक सैद्धांतिक चरम स्थिति है। व्यवहार में आंशिक Crowding Out अधिक सामान्य है, विशेषकर मंदी के दौर में जब ऋण की निजी माँग पहले से दबी होती है और प्रणाली में निष्क्रिय बचत विद्यमान रहती है।
भारत के उच्च सकल राजकोषीय घाटे ने ऐतिहासिक रूप से उत्पादक निजी निवेश के संकुचन की आशंका उत्पन्न की है। Fiscal Responsibility and Budget Management Act जैसे राजकोषीय समेकन ढाँचे सरकारी उधारी को नियंत्रित कर निजी उद्यमों, विशेषकर MSMEs और अवसंरचना विकासकर्ताओं, के लिए पर्याप्त ऋण-अवकाश सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं।
प्रति-चक्रीय राजकोषीय विस्तार और दीर्घकालिक ऋण-स्थिरता के मध्य संतुलन के लिए सुपरिकलित उधारी रणनीतियाँ अनिवार्य हैं। पूँजी बाज़ारों की गहराई बढ़ाना और सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता में सुधार, Crowding Out को न्यूनतम करते हुए विकास की गति बनाए रखने के लिए आवश्यक उपाय हैं।
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