मुद्रास्फीति एक एकरूप समष्टि-आर्थिक परिघटना नहीं है। इसके मूल कारण — चाहे वह माँग-पक्षीय आधिक्य हो, आपूर्ति-पक्षीय आघात हो, या संरचनात्मक कठोरता — की सटीक पहचान ही प्रभावी नीति-निर्माण की पूर्वशर्त है।
यह तब उत्पन्न होती है जब समग्र माँग अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता से निरंतर अधिक हो जाती है। विस्तारवादी राजकोषीय नीति, अत्यधिक ऋण-वृद्धि अथवा उपभोक्ता व्यय में उछाल इसके प्रमुख कारण हैं। भारत में बड़े राजकोषीय घाटों के मौद्रीकरण ने ऐतिहासिक रूप से माँग-जनित दबाव उत्पन्न किए हैं, जिससे Reserve Bank of India का मौद्रिक प्रबंधन जटिल हुआ है।
आपूर्ति-पक्षीय आघात — कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, मजदूरी वृद्धि या कच्चे माल की आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान — समग्र आपूर्ति वक्र को बाईं ओर स्थानांतरित कर देते हैं, जिससे माँग में वृद्धि के बिना ही कीमतें बढ़ती हैं। पेट्रोलियम उत्पादों के माध्यम से आयातित मुद्रास्फीति के प्रति भारत की संवेदनशीलता, headline एवं core दोनों प्रकार की मुद्रास्फीति को प्रभावित करती है।
संरचनात्मक मुद्रास्फीति गहरी जड़ें जमाई कठोरताओं से उत्पन्न होती है — अपर्याप्त भंडारण एवं cold-chain अवसंरचना, विखंडित कृषि बाजार और कमजोर ग्रामीण संपर्क। ये अवरोध आपूर्ति को माँग-संकेतों के प्रति लोचशील रूप से प्रतिक्रिया देने से रोकते हैं। भारत में सब्जियों और दालों में बार-बार होने वाली खाद्य मुद्रास्फीति मुख्यतः संरचनात्मक है, न कि विशुद्ध मौद्रिक।
संरचनात्मक मुद्रास्फीति का उपचार केवल मौद्रिक कसाव से करना प्रतिकूल होता है — यह माँग को दबाता है किंतु आपूर्ति-पक्षीय विफलताओं को संबोधित नहीं करता। प्रभावी शासन के लिए स्तरीय प्रतिक्रिया आवश्यक है: माँग-जनित के लिए मौद्रिक अनुशासन, लागत-जनित के लिए आपूर्ति-शृंखला सुधार, और संरचनात्मक कारणों के लिए दीर्घकालिक अवसंरचना निवेश।
मुद्रास्फीति के प्रकार का सटीक निदान यह निर्धारित करता है कि समाधान केंद्रीय बैंक, वित्त मंत्रालय अथवा क्षेत्र-विशिष्ट नियामकों के अधिकार-क्षेत्र में है। इन श्रेणियों को एकसमान मानने से नीतिगत असंगति उत्पन्न होती है, जो मूल्य-स्थिरता सुनिश्चित किए बिना विकास की कीमत वसूलती है।
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