International Grains Council (IGC) एक अंतर-सरकारी निकाय है जो वैश्विक अनाज व्यापार में स्थिरता और खाद्य सुरक्षा को सुगम बनाता है। नीति-विमर्श में इसकी सदस्यता और नियामक दायरे को प्रायः भ्रामक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
Grains Trade Convention के अंतर्गत स्थापित IGC मुख्यतः सूचना-आदान-प्रदान, बाज़ार पारदर्शिता और अनाज-व्यापारी राष्ट्रों के मध्य नीति-समन्वय का मंच है। यह गेहूँ, मोटे अनाज, चावल, तिलहन और दलहन की वैश्विक आपूर्ति, माँग एवं व्यापार प्रवाह की निगरानी करता है। इसका अधिदेश परामर्शी एवं सुविधाप्रदायी है, न कि नियामक या प्रवर्तन-आधारित।
भारत IGC का सदस्य है, जिससे उसे बाज़ार-सूचना, व्यापार डेटा और अनाज बाज़ारों पर बहुपक्षीय परामर्श तक पहुँच प्राप्त होती है। यह सदस्यता वैश्विक खाद्य सुरक्षा संवाद में भारत की भागीदारी को सुदृढ़ करती है और घरेलू खरीद तथा निर्यात नीतियों को परिष्कृत करने में सहायक है।
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि IGC की सदस्यता किसी भी देश के लिए चावल, गेहूँ या अन्य अनाज के निर्यात-आयात की कानूनी पूर्वापेक्षा नहीं है। कृषि वस्तुओं का व्यापार द्विपक्षीय समझौतों, WTO प्रतिबद्धताओं और घरेलू विनियमों द्वारा संचालित होता है। गैर-सदस्य देश भी वैश्विक अनाज बाज़ारों में स्वतंत्र रूप से भाग लेते हैं।
IGC में भारत की भागीदारी National Food Security Act और बफर स्टॉक मानदंडों सहित उसकी खाद्य सुरक्षा संरचना की पूरक है। IGC के आँकड़े Minimum Support Price संशोधनों और निर्यात प्रतिबंधों संबंधी निर्णयों को सूचित करते हैं, जैसा कि हाल की वैश्विक आपूर्ति-व्यवधान की स्थितियों में देखा गया।
IGC बाज़ार पारदर्शिता का एक उपयोगी मंच है, अनाज व्यापार का द्वारपाल नहीं। भारत की सदस्यता उसकी नीतिगत सूचना-क्षमता को बढ़ाती है, किंतु व्यापार पहुँच IGC संबद्धता से स्वतंत्र बहुपक्षीय एवं द्विपक्षीय ढाँचों द्वारा निर्धारित होती है।
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