1997 की एशियाई वित्तीय संकट ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की अचानक पूंजी-पलायन के प्रति संवेदनशीलता उजागर की, जिसके बाद क्षेत्रीय वित्तीय सुरक्षा-जाल की आवश्यकता प्रमुखता से उभरी। CMIM इस चुनौती के प्रति एशिया की सर्वाधिक संस्थागत सामूहिक प्रतिक्रिया है।
CMIM का विकास वर्ष 2000 में स्थापित मूल Chiang Mai Initiative के द्विपक्षीय स्वैप व्यवस्थाओं से होते हुए ASEAN+3 देशों — ASEAN सदस्य तथा चीन, जापान और दक्षिण कोरिया — के बहुपक्षीय ढाँचे के रूप में हुआ। यह एक संचित आरक्षित व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत सदस्य केंद्रीय बैंक भुगतान-संतुलन संकट के दौरान स्थानीय मुद्राओं को अमेरिकी डॉलर से स्वैप कर सकते हैं।
CMIM का प्रशासन IMF द्वारा नहीं, बल्कि सदस्य देशों के वित्त मंत्रालयों और केंद्रीय बैंकों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। तथापि, किसी सदस्य के आहरण अधिकार का एक महत्त्वपूर्ण भाग — ऐतिहासिक रूप से लगभग 70 प्रतिशत — सक्रिय IMF कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसे 'IMF de-linked portion' की शर्त कहा जाता है। यह संबद्धता व्यवस्था की स्वायत्तता को सीमित करती है।
ASEAN+3 Macroeconomic Research Office (AMRO), जो एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थापित है, CMIM के लिए समर्पित निगरानी एवं तकनीकी सहायता निकाय के रूप में कार्य करता है। यह क्षेत्रीय समष्टि-आर्थिक स्थितियों की निगरानी करता है, संवेदनशीलताओं का आकलन करता है और स्वैप सक्रियण निर्णयों हेतु विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करता है।
CMIM को किसी वास्तविक संकट में कभी सक्रिय नहीं किया गया, जिससे इसकी परिचालन विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न उठते हैं। सदस्य देशों के मध्य भू-राजनीतिक तनाव और आहरण शर्तों से जुड़ा IMF कलंक इसे एक प्रभावी क्षेत्रीय अंतिम-उपाय ऋणदाता के रूप में स्थापित होने से रोकते हैं।
CMIM क्षेत्र की वित्तीय आत्मनिर्भरता की आकांक्षा को मूर्त रूप देता है, किंतु इसकी IMF शर्त और अपरीक्षित सक्रियण तंत्र संस्थागत अभिकल्पना तथा परिचालन तत्परता के मध्य की खाई को उजागर करते हैं — जिसे सुदृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और AMRO की विश्लेषणात्मक क्षमता से ही पाटा जा सकता है।
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