1926 के Hilton-Young Commission ने एक स्थिर रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर को संस्थागत रूप दिया, जिससे भारत की मौद्रिक संरचना घरेलू आर्थिक आवश्यकताओं के बजाय साम्राज्यिक वित्तीय हितों के अधीन हो गई — यह औपनिवेशिक आर्थिक शासन की एक निर्णायक विशेषता थी।
ब्रिटेन ने विनिमय दर को स्टर्लिंग के अनुकूल स्तर पर निर्धारित किया ताकि 'Home Charges' — अर्थात् प्रशासनिक, सैन्य एवं ऋण दायित्वों के लिए भारत द्वारा ब्रिटेन को भेजे जाने वाले भुगतान — का मूल्य सुरक्षित रहे। अधिमूल्यित रुपये ने इन प्रेषणों को ब्रिटिश Crown के लिए सस्ता बनाया, जबकि भारतीय करदाताओं और निर्यातकों पर वास्तविक भार बढ़ता गया।
Commission ने भारतीय सरकारी प्रतिभूतियाँ धारण करने वाले ब्रिटिश निवेशकों एवं लेनदारों को आश्वस्त करने हेतु विनिमय स्थिरता को प्राथमिकता दी। एक पूर्वानुमेय दर ने भारतीय रेलवे, बागानों और व्यापार में लगी ब्रिटिश पूँजी के मुद्रा-जोखिम को कम किया, जिससे भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता महानगरीय वित्तीय विश्वास के अधीन हो गई।
कृत्रिम रूप से उच्च रुपये ने भारतीय कृषि निर्यातकों — कपास, जूट, गेहूँ — की रुपया-अंकित आय को दबाया, जबकि आयातित ब्रिटिश विनिर्मित वस्तुएँ अपेक्षाकृत सस्ती हो गईं, जिससे उभरते भारतीय उद्योग कमज़ोर पड़े। इस असमानता ने भारत की भूमिका को एक औद्योगीकरण-उन्मुख अर्थव्यवस्था के बजाय कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के रूप में सुदृढ़ किया।
Commission की अनुशंसाओं के फलस्वरूप Reserve Bank of India (1935) की स्थापना हुई, तथापि प्रारंभिक मौद्रिक ढाँचे में स्टर्लिंग-संबद्ध विनिमय संरचना बनी रही। यह दर्शाता है कि औपनिवेशिक नीति में संस्थागत सुधार और संरचनात्मक निरंतरता एक साथ विद्यमान रह सकते हैं।
औपनिवेशिक मुद्रा नीति केवल एक तकनीकी मौद्रिक विकल्प नहीं थी, बल्कि साम्राज्यिक निष्कर्षण की एक शासन-प्रणाली थी। इस विरासत की समझ भारत की स्वतंत्रता-पश्चात् मौद्रिक संप्रभुता एवं निर्यात-आधारित विकास रणनीति के विश्लेषण के लिए अनिवार्य है।
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