NBFCs भारत की वित्तीय संरचना में एक महत्त्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाती हैं — वे उन वर्गों को ऋण उपलब्ध कराती हैं जिन तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाते, किंतु ये एक भिन्न एवं अपेक्षाकृत सीमित विनियामक परिधि में कार्य करती हैं।
NBFCs माँग जमा (demand deposits) स्वीकार नहीं कर सकतीं, जो उन्हें वाणिज्यिक बैंकों से मूलभूत रूप से अलग करता है। इन्हें भुगतान एवं निपटान प्रणाली से भी बाहर रखा गया है, अतः ये अपने नाम पर चेक जारी नहीं कर सकतीं। इससे इनकी लेन-देन उपयोगिता सीमित होती है, परंतु प्रणालीगत जोखिम भी अपेक्षाकृत कम रहता है।
सभी NBFCs के लिए Reserve Bank of India के पास पंजीकरण अनिवार्य नहीं है; कृषि वित्तपोषण में संलग्न संस्थाएँ अथवा निर्धारित परिसंपत्ति सीमा से नीचे की संस्थाएँ इससे मुक्त हैं। RBI द्वारा हाल के वर्षों में लागू scale-based regulatory framework NBFCs को आकार एवं प्रणालीगत महत्त्व के आधार पर वर्गीकृत कर आनुपातिक निगरानी सुनिश्चित करता है।
जमा स्वीकार करने वाली NBFCs में जमाकर्ताओं को Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation (DICGC) का संरक्षण प्राप्त नहीं होता, जबकि बैंक जमाकर्ताओं को यह सुविधा उपलब्ध है। यह स्थिति विशेषतः लघु NBFCs के खुदरा जमाकर्ताओं के लिए गंभीर उपभोक्ता जोखिम उत्पन्न करती है और वित्तीय समावेशन नीति-विमर्श में यह चिंता बार-बार उठती रही है।
NBFCs सामूहिक रूप से MSMEs, वाहन वित्त और आवास क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण प्रदान करती हैं। इस क्षेत्र में तरलता संकट की घटनाओं ने व्यापक वित्तीय प्रणाली पर संक्रामक जोखिम प्रदर्शित किए हैं, जिसके फलस्वरूप RBI ने तरलता कवरेज मानदंडों एवं अभिशासन मानकों को क्रमशः कठोर किया है।
NBFCs के ऋण-वितरण की चपलता को बाधित किए बिना उनके विनियमन को सुदृढ़ करने हेतु संतुलित निगरानी आवश्यक है — जमाकर्ता संरक्षण की कमियों को दूर करते हुए अंतिम-छोर वित्तीय मध्यस्थता में इस क्षेत्र की तुलनात्मक क्षमता को अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए।
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