भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय बैंक एवं मौद्रिक प्राधिकरण के रूप में, अपनी वैधानिक कार्यों के माध्यम से आय अर्जित करता है, न कि व्यावसायिक गतिविधियों से — यही तथ्य इसे वाणिज्यिक वित्तीय संस्थाओं से मौलिक रूप से पृथक करता है।
RBI सरकारी प्रतिभूतियों की खुले बाज़ार में क्रय-विक्रय के माध्यम से आय अर्जित करता है। अपने पोर्टफोलियो में धारित सरकारी बॉन्डों पर प्राप्त ब्याज इसके राजस्व का महत्त्वपूर्ण भाग है। ये परिचालन एक साथ प्रणाली में तरलता प्रबंधन के माध्यम से मौद्रिक नीति उद्देश्यों की पूर्ति भी करते हैं।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के प्रबंधन से विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों पर ब्याज एवं मुद्रा लेनदेन से लाभ के रूप में आय प्राप्त होती है। RBI रुपये को स्थिर रखने हेतु forex बाज़ार में हस्तक्षेप करता है तथा सुरक्षित विदेशी साधनों में भंडार की तैनाती से प्राप्त प्रतिफल इसकी आय में वृद्धि करता है।
Currency and Coinage Act के ढाँचे के अंतर्गत RBI को करेंसी नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार प्राप्त है। Seigniorage — अर्थात् मुद्रा के अंकित मूल्य एवं उसकी उत्पादन लागत का अंतर — सरकार की देयता संरचना के माध्यम से अंतरित एक काल्पनिक आय का प्रतिनिधित्व करता है।
Repo परिचालनों के माध्यम से अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को तथा Ways-and-Means Advances के माध्यम से केंद्र एवं राज्य सरकारों को दिए गए ऋणों पर अर्जित ब्याज एक अन्य आय-स्रोत है। RBI निजी कंपनियों को ऋण नहीं देता, जिससे इसका गैर-वाणिज्यिक स्वरूप सुरक्षित रहता है।
अपने व्यय की पूर्ति एवं आकस्मिक भंडार के रखरखाव के पश्चात् RBI अपना अधिशेष प्रतिवर्ष केंद्र सरकार को अंतरित करता है। RBI Act द्वारा शासित यह अंतरण केंद्रीय बैंक की एक सार्वजनिक संस्था के रूप में भूमिका को प्रतिबिंबित करता है, जिसकी आय अंततः राष्ट्रहित में उपयोग होती है।
RBI की आय-संरचना उसके नीतिगत दायित्व से अविभाज्य है। विवेकपूर्ण भंडार प्रबंधन के माध्यम से तुलन-पत्र को सुदृढ़ करना परिचालन स्वायत्तता सुनिश्चित करता है, जबकि पारदर्शी अधिशेष-अंतरण मानदंड केंद्रीय बैंक एवं सरकार के मध्य राजकोषीय जवाबदेही बनाए रखते हैं।
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