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Sagarmala Programme / Maritime Infrastructure — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Economy · UPSC CSE
प्रश्न: सागरमाला कार्यक्रम — बंदरगाह-नेतृत्व आर्थिक विकास, तटीय अवसंरचना, और Sagarmala 2.0 के अंतर्गत समुद्री नवाचार

प्रस्तावना

भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा एक अल्प-उपयोगित आर्थिक संपदा बनी हुई है। Sagarmala Programme बंदरगाहों को केवल पारगमन केंद्र मानने की परंपरागत सोच से हटकर उन्हें क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय विकास के इंजन के रूप में स्थापित करने की संरचनात्मक पहल है।

मुख्य बिंदु

1. मूल अधिदेश: बंदरगाह-नेतृत्व विकास

Sagarmala का मूलभूत उद्देश्य बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, संपर्क-सुधार और बंदरगाह-समीपस्थ औद्योगीकरण के माध्यम से लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना है। तटीय आर्थिक क्षेत्रों, मत्स्य समूहों और अंतिम-मील रेल-सड़क संपर्क को एकीकृत कर यह कार्यक्रम हिंटरलैंड की आर्थिक क्षमता को सक्रिय करता है। यह दृष्टिकोण GDP में लॉजिस्टिक्स लागत की ऐतिहासिक रूप से उच्च हिस्सेदारी की समस्या को सीधे संबोधित करता है।

2. रणनीति की पुष्टि करते मापनीय परिणाम

तटीय नौवहन टनभार में प्रगति, National Waterways ढाँचे के अंतर्गत अंतर्देशीय जलमार्ग कार्गो संचलन, और वैश्विक बंदरगाह प्रदर्शन सूचकांकों में सुधरी रैंकिंग कार्यक्रम की परिचालन गति को प्रमाणित करती है। Ro-Ro फेरी सेवाओं और प्रमुख बंदरगाहों से जुड़े समर्पित माल-गलियारों ने टर्नअराउंड समय घटाया है। ये परिणाम पुष्टि करते हैं कि अवसंरचना-प्रथम रणनीति दक्षता लाभ दे रही है।

3. Sagarmala 2.0: निरंतरता के साथ उन्नत महत्वाकांक्षा

Sagarmala 2.0 मूल अवसंरचना अधिदेश को नहीं छोड़ता, बल्कि उस पर हरित नौवहन, डिजिटल बंदरगाह प्रबंधन और समुद्री प्रौद्योगिकी ऊष्मायन को जोड़कर आगे बढ़ता है। Atmanirbhar Bharat और Viksit Bharat 2047 के अनुरूप यह स्वदेशी जहाज-निर्माण क्षमता को लक्षित करता है और भारत को वैश्विक समुद्री सेवा केंद्र के रूप में स्थापित करता है। यह मूल ढाँचे का विकास है, विरोधाभास नहीं।

4. शासन एवं कार्यान्वयन की चुनौतियाँ

केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य समुद्री बोर्डों और बंदरगाह न्यासों के बीच बहु-एजेंसी समन्वय एक स्थायी अवरोध बना हुआ है। बंदरगाह-समीपस्थ औद्योगिक समूहों के लिए भूमि अधिग्रहण और तटीय परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ विलंब उत्पन्न करती हैं। दोनों चरणों में गति बनाए रखने के लिए एकल-खिड़की संस्थागत तंत्र को सुदृढ़ करना अनिवार्य है।

निष्कर्ष

Sagarmala की विकास-यात्रा यह स्थापित करती है कि भौतिक अवसंरचना और नवाचार परस्पर प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक अनिवार्यताएँ हैं। निरंतर अंतर-एजेंसी समन्वय और पर्याप्त राजकोषीय प्रतिबद्धता ही यह निर्धारित करेगी कि भारत 2047 तक अपनी तटीय भौगोलिक स्थिति को स्थायी आर्थिक लाभ में परिवर्तित कर पाता है या नहीं।

शब्द गणना: 323

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