भारत की आर्थिक संरचना एक स्थायी विरोधाभास प्रकट करती है: कृषि क्षेत्र सर्वाधिक कार्यबल को रोजगार देता है, किंतु GDP में उसका योगदान अनुपातहीन रूप से कम है, जो समावेशी विकास को बाधित करने वाली गहरी संरचनात्मक अकुशलताओं का संकेत देता है।
कृषि क्षेत्र भारत के लगभग आधे कार्यबल को रोजगार देता है, जबकि GDP में उसका योगदान 20% से कम है। यह प्राथमिक क्षेत्र में श्रम उत्पादकता की निम्नता को दर्शाता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने कार्यबल को द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में स्थानांतरित किया है, जहाँ प्रति श्रमिक मूल्य-संवर्धन कहीं अधिक है। यह विचलन भारत के अपूर्ण संरचनात्मक रूपांतरण की मूल विशेषता है।
भारत का सेवा क्षेत्र GDP में 50% से अधिक योगदान करता है और द्वितीयक क्षेत्र से अधिक श्रमिकों को रोजगार देता है, किंतु यह वृद्धि IT एवं वित्त जैसे उच्च-कौशल खंडों तक सीमित है और ग्रामीण प्रवासी श्रमिकों को इसका लाभ नहीं मिलता। विनिर्माण क्षेत्र, पूर्वी एशियाई विकास मॉडलों की तुलना में, अधिशेष कृषि श्रम को अपेक्षित मात्रा में अवशोषित करने में विफल रहा है।
श्रम-सघन विनिर्माण, कौशल विकास एवं ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएँ इस अंतराल को पाटने का प्रयास करती हैं। तथापि, अपर्याप्त अवसंरचना, कठोर कारक बाजार एवं निम्न मानव पूँजी निर्माण, कार्यबल के प्राथमिक से उच्च-उत्पादकता क्षेत्रों में संक्रमण की गति को मंद करते हैं।
कृषि रोजगार का एक बड़ा भाग प्रच्छन्न बेरोजगारी को छुपाता है, जहाँ श्रम की सीमांत उत्पादकता शून्य के निकट होती है। भूमि समेकन, अनुबंध कृषि ढाँचे एवं कृषि मूल्य-श्रृंखला में निवेश के माध्यम से इस अव्यक्त श्रम को उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में उत्पादक रूप से स्थानांतरित करना आवश्यक है।
भारत के क्षेत्रीय कार्यबल संक्रमण को गति देने के लिए विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता, व्यावसायिक कौशल-विकास एवं कृषि उत्पादकता में एक साथ निवेश अपेक्षित है — ताकि श्रम गतिशीलता शहरी अनौपचारिकता में नहीं, बल्कि वास्तविक कल्याण-लाभ में परिणत हो।
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