सतत वित्त साधन — हरित, सामाजिक एवं जलवायु बॉन्ड — निजी पूँजी को Paris Agreement के 2°C से नीचे तापमान सीमित रखने के लक्ष्य की ओर प्रवाहित करने हेतु महत्त्वपूर्ण तंत्र के रूप में उभरे हैं।
हरित एवं जलवायु बॉन्ड ऐसे ऋण साधन हैं जिनकी आय नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन और जलवायु अनुकूलन जैसी पर्यावरणीय परियोजनाओं हेतु आरक्षित रहती है। International Capital Market Association के Green Bond Principles निर्गमन, आय के उपयोग और रिपोर्टिंग के लिए स्वैच्छिक ढाँचा प्रदान करते हैं, जिससे बाज़ार की विश्वसनीयता सुनिश्चित होती है।
विगत एक दशक में वैश्विक सतत बॉन्ड निर्गमन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें संप्रभु सरकारें, बहुपक्षीय विकास बैंक और कॉर्पोरेट संस्थाएँ सहभागी हैं। भारत ने 2023 में अपना प्रथम संप्रभु हरित बॉन्ड जारी किया, जो सार्वजनिक उधारी को निम्न-कार्बन अवसंरचना की ओर निर्देशित करने की संस्थागत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
सार्वभौमिक रूप से बाध्यकारी वर्गीकरण के अभाव में ग्रीनवॉशिंग का जोखिम उत्पन्न होता है, जहाँ आय को भ्रामक रूप से जलवायु-अनुकूल बताया जाता है। SEBI ने भारत में हरित ऋण प्रतिभूतियों हेतु प्रकटीकरण मानदंड लागू किए हैं, किंतु विभिन्न न्यायक्षेत्रों में प्रवर्तन क्षमता और तृतीय-पक्ष सत्यापन मानक असमान बने हुए हैं।
विकासशील देशों को संरचनात्मक असुविधा का सामना करना पड़ता है — उच्च संप्रभु जोखिम प्रीमियम सतत बॉन्ड निर्गमन की लागत बढ़ा देते हैं। रियायती सार्वजनिक निधि एवं निजी पूँजी को संयुक्त करने वाले Blended Finance तंत्र इस अंतराल को पाटने और जलवायु वित्त को संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं तक पहुँचाने के लिए अनिवार्य हैं।
सतत बॉन्ड एक आवश्यक किंतु अपर्याप्त साधन हैं। जलवायु वित्त अंतराल को पाटने के लिए सुसंगत वर्गीकरण, विश्वसनीय सत्यापन तंत्र और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को रियायती सहायता अनिवार्य है, ताकि पूँजी प्रवाह Paris Agreement की महत्त्वाकांक्षाओं के अनुरूप हो सके।
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