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Taxation / Income Tax — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

Economy · UPSC CSE
प्रश्न: भारत में कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों का कराधान — Income Tax Act, 1961 के अंतर्गत छूट, पूंजी परिसंपत्ति वर्गीकरण और नीतिगत औचित्य

प्रस्तावना

भारत की आयकर संरचना कृषि आय के प्रति सुविचारित उदारता अपनाती है, जो संवैधानिक अभिकल्पना और ग्रामीण आजीविका की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करती है। तथापि, इन छूटों की सटीक सीमाएँ — विशेषतः संबद्ध गतिविधियों और भूमि वर्गीकरण के संदर्भ में — महत्त्वपूर्ण राजकोषीय एवं शासकीय निहितार्थ रखती हैं।

मुख्य बिंदु

1. कृषि आय छूट — विस्तार और सीमाएँ

Income Tax Act, 1961 की Section 2(1A) के अंतर्गत परिभाषित कृषि आय केंद्रीय आयकर से मुक्त है। किंतु यह छूट संकीर्ण रूप से परिभाषित है और सभी संबद्ध गतिविधियों पर स्वतः लागू नहीं होती। उदाहरणतः, कुक्कुट पालन से प्राप्त आय सामान्यतः कृषि आय नहीं मानी जाती और कर योग्य रहती है, क्योंकि कुक्कुट की खेती कृषि-विज्ञान की दृष्टि से भूमि से उत्पन्न नहीं होती।

2. संबद्ध गतिविधियाँ — एक अस्पष्ट क्षेत्र

ऊन उत्पादन (पशुपालन) और डेयरी फार्मिंग जैसी गतिविधियाँ अनिश्चित स्थिति में हैं। यद्यपि ये ग्रामीण कृषि जीवन से आर्थिक रूप से जुड़ी हैं, तथापि ये कृषि आय की वैधानिक परिभाषा की पूर्ति नहीं करतीं, जिसके लिए भूमि-कर्षण से प्रत्यक्ष संबंध अनिवार्य है। कर प्राधिकरणों ने निरंतर ऐसी गतिविधियों की आय को व्यावसायिक या अन्य आय के रूप में निर्धारित किया है।

3. ग्रामीण कृषि भूमि — पूंजी परिसंपत्ति वर्गीकरण

ग्रामीण कृषि भूमि को Section 2(14) के अंतर्गत 'पूंजी परिसंपत्ति' की परिभाषा से स्पष्टतः बाहर रखा गया है, जो नगरपालिका सीमाओं से निर्धारित दूरी मानदंडों के अधीन है। फलस्वरूप, ऐसी भूमि के हस्तांतरण से उत्पन्न लाभ पूंजीगत लाभ कर के अधीन नहीं होता, जो लघु एवं सीमांत भूमिधारकों को सार्थक संरक्षण प्रदान करता है।

4. नीतिगत औचित्य और राजकोषीय संघवाद

संविधान के अंतर्गत कृषि आय का कराधान राज्य विधानमंडलों की विधायी क्षमता में आता है। शक्तियों के इस विभाजन के कारण केंद्र सरकार की छूटें और राज्यों के विभिन्न कृषि आयकर व्यवस्थाएँ एक साथ विद्यमान रहती हैं, जिससे एक स्तरीय राजकोषीय संरचना निर्मित होती है जिसके लिए सावधानीपूर्ण समन्वय आवश्यक है।

निष्कर्ष

वास्तविक कृषि आय को संबद्ध वाणिज्यिक गतिविधियों से पृथक करना एक स्थायी प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है। निर्वाह-स्तरीय कृषकों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इन सीमाओं का युक्तिसंगत निर्धारण, न्यायसंगत कर अनुपालन और गैर-कृषि संस्थाओं द्वारा छूट के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए अनिवार्य है।

शब्द गणना: 323

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