जैन दर्शन कर्म का सबसे प्रारंभिक और सुव्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जिसमें कर्म को अमूर्त भाग्य नहीं, बल्कि सूक्ष्म भौतिक कण — Pudgala — के रूप में परिभाषित किया गया है, जो आत्मा (Jiva) को आबद्ध कर पुनर्जन्म के चक्र को बनाए रखते हैं।
जैन तत्त्वमीमांसा में कर्म को सूक्ष्म कार्मण पुद्गल (Karmana Pudgala) के रूप में समझा जाता है, जो मानसिक, वाचिक और शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से आत्मा से संलग्न होता है। यह भौतिक दृष्टिकोण जैन दर्शन को वेदांत और बौद्ध परंपराओं से स्पष्ट रूप से पृथक करता है, जो कर्म को द्रव्य नहीं, बल्कि संकल्पशक्ति मानते हैं।
जिस प्रक्रिया द्वारा कार्मण पुद्गल आत्मा में प्रवेश कर उससे चिपकता है, उसे Asrava कहा जाता है। कषाय (Kashaya) — क्रोध, लोभ, मान और माया — से प्रेरित क्रियाएँ इस आस्रव को तीव्र करती हैं, जिससे नैतिक आत्म-नियमन जैन साधना का केंद्रीय तत्त्व बन जाता है।
कार्मण पुद्गल के संलग्न होने पर Bandha (बंधन) उत्पन्न होता है, जो आत्मा की भावी अस्तित्व-दशाओं को निर्धारित करता है। मोक्ष (Moksha) की प्राप्ति के लिए Samvara (आस्रव का निरोध) और Nirjara (संचित कर्म का निर्जरण) आवश्यक हैं, जो कठोर तपश्चर्या और अहिंसा के माध्यम से संभव होते हैं।
जैन कर्म सिद्धांत ने अहिंसा को व्यक्तिगत आचरण के शासन-सिद्धांत के रूप में सुदृढ़ किया और व्यापक भारतीय नैतिक विमर्श को प्रभावित किया। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व और अहिंसा पर इसके बल ने परवर्ती सुधार आंदोलनों और पर्यावरणीय नैतिकता की बहसों में भी अनुगूँज उत्पन्न की।
जैन कर्म दर्शन, नैतिक परिणामों को भौतिक रूप से वास्तविक मानकर, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का एक सुदृढ़ ढाँचा प्रस्तुत करता है। इसकी स्थायी प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि यह नैतिक आचरण को दैवीय विधान के स्थान पर कार्य-कारण के प्रत्यक्ष सिद्धांत पर आधारित करता है।
GS Answer Coach आपके उत्तर को Introduction, Body, Conclusion के आधार पर परखता है — 30 सेकंड में।
Essay Coach · GS Answer Coach · Cutoff Planner · 500+ Mains PYQs — साइन अप मुफ्त।