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Ancient India / Pallava Dynasty — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

History · UPSC CSE
प्रश्न: पल्लव वंश — सांस्कृतिक एवं स्थापत्य योगदान, विशेष रूप से Mahendravarman I की साहित्यिक एवं शैलकृत मंदिर स्थापत्य में विरासत

प्रस्तावना

पल्लव वंश (6वीं–9वीं शताब्दी ई.) दक्षिण भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, जिसने साहित्यिक सृजनशीलता एवं स्थापत्य प्रयोगधर्मिता को समन्वित कर द्रविड़ मंदिर परंपरा को स्थायी रूप से आकार दिया।

मुख्य बिंदु

1. Mahendravarman I: बहुमुखी प्रतिभा के राजा

Mahendravarman I ने संस्कृत व्यंग्य नाटक 'Mattavilasa Prahasana' की रचना की, जो धार्मिक भिक्षुओं पर तीक्ष्ण टिप्पणी करता है और उनकी उदार बौद्धिक प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करता है। प्रारंभ में जैन धर्म के संरक्षक रहे, किंतु संत Appar के प्रभाव से शैव मत में दीक्षित होने के पश्चात उनकी कलात्मक ऊर्जा हिंदू मंदिर निर्माण की ओर उन्मुख हुई।

2. शैलकृत स्थापत्य का प्रवर्तन

Mahendravarman I को दक्षिण भारत में शैलकृत गुहा मंदिर परंपरा का प्रणेता माना जाता है, जो पूर्ववर्ती संरचनात्मक मंदिर शैली से भिन्न थी। Mahabalipuram एवं Trichinopoly जैसे स्थलों पर ग्रेनाइट पहाड़ियों को काटकर निर्मित इन मंडपों में कटे पत्थर या गारे की आवश्यकता नहीं थी, जो एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी परिवर्तन था। इस नवाचार ने परवर्ती एकाश्म रथों एवं संरचनात्मक मंदिरों की वैचारिक नींव रखी।

3. स्थापत्य महत्त्व एवं विरासत

Mahendravarman I के अधीन प्रारंभ हुई शैलकृत शैली Narasimhavarman I के काल में Mahabalipuram के प्रसिद्ध Shore Temple परिसर एवं Pancha Rathas के रूप में विकसित हुई, जो अब UNESCO World Heritage Site है। यह स्थापत्य परंपरा उस द्रविड़ गोपुरम शैली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, जो आज भी दक्षिण भारतीय मंदिर नगरीयता को परिभाषित करती है।

4. कला एवं शासन का सांस्कृतिक समन्वय

एक ही शासक के अधीन साहित्यिक संरक्षण एवं स्थापत्य नवाचार का संगम यह दर्शाता है कि पल्लव राजनीति ने सांस्कृतिक उत्पादन को वैधता के साधन के रूप में प्रयुक्त किया। मंदिर एक साथ धार्मिक केंद्र, आर्थिक इकाई एवं राजकीय सत्ता के प्रतीक थे — यह शासन प्रतिमान परवर्ती राजवंशों ने सचेत रूप से अपनाया।

निष्कर्ष

Mahendravarman I की द्विविध विरासत — साहित्यिक व्यंग्य एवं शैलकृत मंदिर नवाचार — यह प्रमाणित करती है कि स्थायी राजनीति सांस्कृतिक संरक्षण को भौतिक निवेश के साथ समन्वित करती है, जो सिद्धांत सातवीं शताब्दी के दक्षिण भारत की भाँति आज की विरासत प्रशासन में भी प्रासंगिक है।

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