भास, संस्कृत के आरंभिक एवं सर्वाधिक प्रतिभाशाली नाटककारों में से एक, Kalidasa से पूर्ववर्ती हैं और भारतीय शास्त्रीय नाट्य परंपरा की आधारभूत कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी पुनः खोजी गई रचनाओं ने प्राचीन नाट्यकला की समझ को नया आयाम दिया।
भास को आरोपित तेरह नाटकों की पुनः खोज बीसवीं शताब्दी के आरंभ में विद्वान T. Ganapati Shastri ने केरल में की। Svapnavasavadatta, Pratijnyaugandharayana और Charudatta इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इनका भास को आरोपण शैलीगत एकरूपता तथा Kalidasa सहित परवर्ती लेखकों के संदर्भों पर आधारित है।
भास ने Ramayana, Mahabharata और पौराणिक परंपराओं से प्रसंग लेकर उन्हें पर्याप्त नाट्य स्वतंत्रता के साथ रूपांतरित किया। परवर्ती शास्त्रीय परंपराओं के विपरीत, उनके नाटकों में मृत्यु का मंचन भी होता है, जो कम संहिताबद्ध नाट्य व्याकरण का संकेत देता है। Duryodhana के पतन को चित्रित करने वाला Urubhanga संस्कृत नाटक में दुर्लभ त्रासद संवेदनशीलता का उदाहरण है।
भास की रचनाएँ भाण, नाटिका और नाटक जैसे अनेक नाट्य रूपों में दक्षता प्रदर्शित करती हैं, जो Natyashastra में संहिताबद्ध विविधता को प्रतिबिंबित करती हैं। उनकी भाषा संस्कृत और प्राकृत बोलियों का संतुलन बनाती है, जो प्रदर्शन परंपरा में विविध दर्शकों एवं सामाजिक स्तरों के प्रति सजगता दर्शाती है।
भास के नाटक आरंभिक शास्त्रीय भारत के दरबारी जीवन, राजनीतिक चिंतन और सामाजिक मानदंडों का अप्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। महाकाव्य से शास्त्रीय साहित्यिक संस्कृति की ओर संक्रमण का अध्ययन करने वाले इतिहासकारों के लिए ये प्राथमिक सांस्कृतिक दस्तावेज़ हैं।
भास का रचना-संसार वैदिक मौखिक परंपरा और परिष्कृत शास्त्रीय संस्कृत रंगमंच के बीच सेतु का कार्य करता है। भारत की नाट्य एवं साहित्यिक विरासत के पूर्ण इतिहास के पुनर्निर्माण हेतु उनकी रचनाओं पर निरंतर विद्वत्तापूर्ण अन्वेषण अपरिहार्य है।
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