नागर मंदिर स्थापत्य कला, जो गर्भगृह के ऊपर वक्राकार शिखर द्वारा पहचानी जाती है, Gupta काल से उत्तर एवं मध्य भारत में विकसित होती रही और भारत की सर्वाधिक स्थायी पवित्र निर्माण परंपराओं में से एक है।
नागर शिखर एक मधुमक्खी के छत्ते के आकार का वक्राकार स्तंभ होता है, जो शीर्ष पर आमलक (खाँचेदार चक्र) और कलश से समाप्त होता है। Dravida शैली के सोपानबद्ध पिरामिडनुमा विमान के विपरीत, नागर शिखर एकल जैविक संरचना के रूप में ऊपर उठता है। यह भेद प्रारंभिक मध्यकालीन मंदिरों के वर्गीकरण का आधार है।
Madhya Pradesh के Deogarh स्थित Dashavatara Temple, जो Gupta काल का है, पूर्णतः विकसित नागर शिखर के प्राचीनतम जीवित उदाहरणों में से एक है। इसका वक्राकार शिखर और मूर्तिकला कार्यक्रम उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य में एक निर्णायक मोड़ को दर्शाते हैं। स्थापत्य इतिहास में इसे परवर्ती नागर परंपराओं का प्रारूप माना जाता है।
Badami, Aihole और Pattadakal के मंदिर Chalukyan परंपरा से संबंधित हैं, जिसमें नागर और Dravida दोनों शैलियों का प्रयोग किया गया। Malegitti Shivalaya और Huchimalligudi Temple को सामान्यतः प्रारंभिक Dravida या संक्रमणकालीन संरचनाओं के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। Pattadakal का Virupaksha Temple, Kanchipuram के मंदिरों पर आधारित एक परिपक्व Dravida स्मारक है।
Aihole और Pattadakal की Chalukyan कार्यशालाएँ स्थापत्य प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करती थीं, जहाँ नागर और Dravida तत्त्वों को सचेत रूप से साथ-साथ प्रयुक्त किया गया। कुछ Aihole मंदिरों में नागर शिखर भी मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में शैलीगत सीमाएँ कठोर नहीं, बल्कि पारगम्य थीं।
मंदिर स्थापत्य के वर्गीकरण के लिए केवल भूगोल नहीं, बल्कि संरचनात्मक आकारिकी पर ध्यान देना आवश्यक है। Chalukyan क्षेत्र जैसे स्थलों पर नागर और Dravida परंपराओं के अंतर्संबंध को पहचानना भारत की बहुलवादी कलात्मक विरासत की गहरी समझ प्रदान करता है।
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