असम के ताई-अहोम राजवंश द्वारा निर्मित चराईदेव के मोइदाम, एक विशिष्ट अंत्येष्टि परंपरा के प्रतीक हैं, जिन्हें UNESCO विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित कर उनके असाधारण सार्वभौमिक मूल्य की पुष्टि की गई है।
मोइदाम वे मिट्टी के टीले हैं जिन्हें ताई-अहोम शासकों ने लगभग छः शताब्दियों तक असम पर शासन करते हुए राजकीय एवं कुलीन वर्ग के अंत्येष्टि कक्षों के रूप में निर्मित किया। इनमें राजाओं, रानियों और अभिजात वर्ग के पार्थिव अवशेष तथा उनकी संपत्ति संरक्षित की जाती थी। यह परंपरा अहोम समुदाय की परलोक-विश्वास की मान्यता को दर्शाती है, जो उनकी स्वदेशी ताई धार्मिक परंपराओं में निहित है।
प्रत्येक मोइदाम में एक अर्धगोलाकार मिट्टी के टीले के भीतर मेहराबदार अंत्येष्टि कक्ष होता है, जो प्रायः अष्टभुजाकार परिसीमा दीवार और 'chow-chali' नामक प्रार्थना गृह से घिरा होता है। निर्माण तकनीक में स्वदेशी ताई शिल्पकला और स्थानीय सामग्री का समन्वय है, जो इन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय बनाता है। अहोम राज्य की प्रथम राजधानी चराईदेव में इन स्मारकों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संकेंद्रण है।
चराईदेव के मोइदामों को वर्ष 2024 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया, जिससे ये भारत का 43वाँ विश्व धरोहर स्थल बने। यह मान्यता अहोम सभ्यता की सांस्कृतिक निरंतरता और अंत्येष्टि परंपराओं की असाधारण साक्ष्यता को रेखांकित करती है। इस अंकन से असम में संरक्षण की अनिवार्यता सुदृढ़ होती है और उत्तरदायी धरोहर पर्यटन को प्रोत्साहन मिलता है।
अतिक्रमण, अपर्याप्त बफर क्षेत्र प्रबंधन और सीमित सामुदायिक जागरूकता इन स्मारकों की अखंडता के लिए जोखिम उत्पन्न करते हैं। Archaeological Survey of India और असम राज्य सरकार को UNESCO के Outstanding Universal Value मानदंडों के अनुरूप स्थल प्रबंधन योजनाओं पर समन्वित रूप से कार्य करना होगा, ताकि दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
मोइदाम, अहोम राजनीतिक व्यवस्था और आध्यात्मिक पहचान के अपूरणीय प्रतीक हैं। इनकी अखंडता बनाए रखने के लिए एकीकृत संरक्षण नीति, सामुदायिक सहभागिता और संस्थागत समन्वय अनिवार्य है — जो धरोहर मान्यता को स्थायी सुरक्षा में परिवर्तित करे।
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