अस्पृश्यता के प्रति गांधी का विरोध केवल नैतिक उद्घोष नहीं था, बल्कि यह एक सुसंगठित राजनीतिक प्रतिबद्धता में परिणत हुआ, जिसने जाति-आधारित भेदभाव के उन्मूलन को भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अविभाज्य बना दिया।
गांधी अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर कलंक और मानवीय गरिमा का मूलभूत उल्लंघन मानते थे। उनका तर्क था कि जो समाज ऐसे भेदभाव का आचरण करता हो, वह औपनिवेशिक सत्ता से स्वशासन की माँग में नैतिक अधिकार का दावा नहीं कर सकता। इस संबद्धता ने सामाजिक सुधार को राजनीतिक स्वतंत्रता की पूर्वशर्त बना दिया।
गांधी ने Harijan Sevak Sangh की स्थापना दलित वर्गों के बीच रचनात्मक कार्य — मंदिरों, कुओं और विद्यालयों तक पहुँच सहित — के लिए की। इस संगठन ने स्वैच्छिक प्रयासों को ठोस सामाजिक परिवर्तन में रूपांतरित किया और उत्थान कार्य को Congress के रचनात्मक कार्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया, न कि परिधीय दान-कार्य।
दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों के विरुद्ध गांधी का उपवास — जो Poona Pact में परिणत हुआ — यह दर्शाता है कि वे समुदाय को एकजुट रखने हेतु व्यक्तिगत बलिदान के लिए तत्पर थे। इस प्रसंग ने हरिजन कल्याण को औपचारिक रूप से एक केंद्रीय राजनीतिक सरोकार के रूप में स्थापित किया।
अस्पृश्यता निवारण को गांधी के Constructive Programme में खादी और ग्रामोद्योग के साथ स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया था। इस संस्थागतकरण ने सुनिश्चित किया कि सामाजिक सुधार राजनीतिक स्वतंत्रता के पश्चात नहीं, बल्कि उसके साथ-साथ अनुसरित हो।
गांधी का दृष्टिकोण तात्कालिक राजनीतिक गोलबंदी और दीर्घकालिक सामाजिक रूपांतरण के मध्य एक निरंतर तनाव को उजागर करता है। हाशिये पर स्थित समुदायों की स्थायी मुक्ति के लिए उनके द्वारा प्रतिपादित नैतिक अनुनय के साथ-साथ संरचनात्मक विधिक सुधार भी अनिवार्य है।
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