फरवरी 1922 की Chauri Chaura घटना, जिसमें एक भीड़ ने पुलिस चौकी को जलाकर बीस से अधिक कांस्टेबलों की हत्या की, एक निर्णायक मोड़ बनी — जिसने Mahatma Gandhi को आंदोलन के चरम पर Non-Cooperation Movement को अचानक स्थगित करने पर विवश किया।
Gorakhpur जिले के Chauri Chaura में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस चौकी में आगजनी की गई। औपनिवेशिक प्रशासन ने व्यापक गिरफ्तारियाँ कीं और 170 से अधिक अभियुक्तों पर मुकदमा चला, जिनमें से अनेक को Sessions Court ने प्रारंभ में मृत्युदंड सुनाया।
Motilal Nehru ने अभियुक्तों की ओर से विधिक प्रतिरक्षा दल का नेतृत्व किया और मृत्युदंड को कम कराने तथा उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु प्रयास किए। Allahabad High Court में अपीलों के साथ उनके प्रयासों से फाँसी की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई और अनेक जीवन बचाए जा सके।
Gandhi, हिंसा से गहरे व्यथित होकर, फरवरी 1922 में Bardoli Resolution के माध्यम से एकपक्षीय रूप से Non-Cooperation Movement वापस ले लिया। इस निर्णय की उन नेताओं ने कड़ी आलोचना की, जो मानते थे कि आंदोलन अपनी सर्वाधिक प्रभावशाली अवस्था में छोड़ दिया गया।
इस घटना ने जन-लामबंदी और अनुशासित अहिंसा के बीच के तनाव को उजागर किया — जो किसी भी सविनय अवज्ञा अभियान के लिए एक संरचनात्मक चुनौती है। साथ ही, इसने औपनिवेशिक न्यायिक अतिक्रमण के विरुद्ध राष्ट्रवादी प्रतिरोध के एक स्वरूप के रूप में विधिक सहायता के महत्त्व को भी रेखांकित किया।
Chauri Chaura यह प्रदर्शित करता है कि हिंसा का एक भी प्रसंग किसी समग्र राजनीतिक आंदोलन की दिशा को पुनर्निर्धारित कर सकता है। जन-भागीदारी और सैद्धांतिक संयम के मध्य संतुलन बनाना एक शासन एवं नेतृत्व की चुनौती है, जो औपनिवेशिक संदर्भ से कहीं आगे तक विस्तृत है।
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