1925 में तमिलनाडु में E.V. Ramasamy Periyar द्वारा स्थापित आत्म-सम्मान आंदोलन ने ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था और जाति-पदानुक्रम को चुनौती दी, जिससे यह आधुनिक भारतीय इतिहास के सर्वाधिक उग्र जाति-विरोधी एवं तर्कवादी आंदोलनों में से एक बन गया।
Periyar ने Indian National Congress से मोहभंग के पश्चात यह आंदोलन प्रारंभ किया, क्योंकि राष्ट्रवादी राजनीति में भी जाति-भेद बना रहा। आंदोलन का उद्देश्य निम्न-जाति समुदायों को कर्मकांडीय दासता और ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्त कर तर्कशीलता एवं सामाजिक समानता को स्थापित करना था।
इस आंदोलन ने धार्मिक अंधविश्वास, जाति-आधारित पदानुक्रम और लैंगिक अधीनता को एक साथ अस्वीकार किया। पुरोहित-रहित 'self-respect marriages' को प्रोत्साहित कर धार्मिक सत्ता और पितृसत्तात्मक प्रथाओं को चुनौती दी गई। तर्कवाद, नास्तिकता और सामाजिक समतावाद इसकी बौद्धिक आधारशिला रहे।
आंदोलन की निरंतर गतिशीलता ने तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीतिक जागरण को सुदृढ़ किया और Dravidian दलों के सामाजिक न्याय एजेंडे को आकार दिया। तमिलनाडु की सशक्त आरक्षण नीतियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण पर संस्थागत बल में इसकी स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है।
सामाजिक गरिमा पर आंदोलन का बल Articles 14, 15 और 17 में निहित संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है। यह आंदोलन यह प्रमाणित करता है कि स्थायी सामाजिक सुधार के लिए केवल विधायी हस्तक्षेप नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनीतिक गतिशीलता का समवर्ती संचालन आवश्यक है।
आत्म-सम्मान आंदोलन तृणमूल स्तर से सामाजिक रूपांतरण का एक मानक उदाहरण है। इसकी विरासत यह रेखांकित करती है कि संवैधानिक समानता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ आंतरिक पदानुक्रमों को विखंडित करने वाला सतत सांस्कृतिक सुधार भी हो।
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