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Modern India / Cultural Institutions — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

History · UPSC CSE
प्रश्न: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी चेतना को आकार देने में देशी भाषाई और अंग्रेजी प्रेस की भूमिका

प्रस्तावना

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय प्रेस एक साथ राजनीतिक मंच और चेतना-जागरण का माध्यम था, जिसने देशी भाषाई जन-लामबंदी और अभिजात अंग्रेजी विमर्श को एकीकृत राष्ट्रवादी पहचान में रूपांतरित किया।

मुख्य बिंदु

1. राष्ट्रवादी प्रेस की द्विभाषिक रणनीति

Bal Gangadhar Tilak ने 1881 में 'Kesari' (मराठी) और 'The Mahratta' (अंग्रेजी) को एक साथ प्रारंभ करते हुए दो भिन्न वर्गों को लक्षित किया। Kesari ने मराठीभाषी जनसामान्य में सशक्त एवं भावप्रधान राष्ट्रवाद का संचार किया, जबकि The Mahratta ने शिक्षित अंग्रेजीभाषी पाठकों को तर्कसंगत राजनीतिक विमर्श से जोड़ा। इस द्विस्तरीय दृष्टिकोण ने वर्गीय और भाषाई सीमाओं के पार वैचारिक प्रसार को अधिकतम किया।

2. राजनीतिक लामबंदी के उपकरण के रूप में प्रेस

जब औपचारिक दलीय संरचनाएँ अभी प्रारंभिक अवस्था में थीं, तब राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाएँ वैकल्पिक राजनीतिक संगठनों की भूमिका निभाती थीं। उन्होंने Age of Consent Bill और बंगाल-विभाजन जैसी औपनिवेशिक नीतियों को भारतीय सभ्यता पर आघात के रूप में प्रस्तुत कर प्रशासनिक असंतोष को जन-आंदोलन में परिवर्तित किया। राजद्रोह कानूनों के अंतर्गत संपादकों पर बार-बार मुकदमे चलाए जाने से प्रेस की साम्राज्यवादी सत्ता के लिए खतरे की पुष्टि होती थी।

3. देशी भाषाई एवं अंग्रेजी प्रेस: पूरक भूमिकाएँ

देशी भाषाई समाचारपत्र ग्रामीण और अर्ध-नगरीय क्षेत्रों में पहुँचकर साझी सांस्कृतिक पहचान की भावना को पोषित करते थे। इसके विपरीत, अंग्रेजी पत्र विधान परिषदों, Indian National Congress के नेतृत्व और सहानुभूतिपूर्ण ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करते थे। दोनों मिलकर एक ऐसा सूचना-परितंत्र निर्मित करते थे जो प्रमुख राजनीतिक घटनाओं के मध्यवर्ती काल में राष्ट्रवादी गति को बनाए रखता था।

4. विनियामक प्रतिक्रिया और उसके परिणाम

Vernacular Press Act of 1878 जैसे औपनिवेशिक कानूनों ने देशी भाषाई पत्रकारिता को दबाने का प्रयास किया, किंतु इससे Tilak जैसे संपादक अनायास ही शहादत के प्रतीक बन गए। मुकदमों ने पाठक-वर्ग को और विस्तृत किया तथा औपनिवेशिक शासन के प्रति जन-अविश्वास को गहरा किया। इससे स्पष्ट होता है कि प्रेस-दमन प्रायः राष्ट्रवादी भावना को नियंत्रित करने के बजाय उसे और तीव्र करता था।

निष्कर्ष

देशी भाषाई और अंग्रेजी राष्ट्रवादी पत्रिकाओं का समानांतर संचालन यह प्रदर्शित करता है कि प्रभावी राजनीतिक संप्रेषण के लिए भावनात्मक अनुनाद और तार्किक तर्क दोनों अपरिहार्य हैं। यह स्तरीकृत मीडिया रणनीति विषमांगी समाजों में जनमत-निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए आज भी प्रासंगिक है।

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