ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्थाओं ने भारत की कृषि-अर्थव्यवस्था को मूलतः पुनर्संरचित किया — मध्यवर्ती वर्गों का निर्माण हुआ, किसान विस्थापित हुए और दीर्घकालिक कृषि स्थिरता की कीमत पर औपनिवेशिक अधिशेष अर्जित किया गया।
Cornwallis द्वारा प्रवर्तित इस व्यवस्था ने ज़मींदारों के साथ भू-राजस्व को स्थायी रूप से निर्धारित किया, जिससे वे वास्तविक भू-स्वामी बन गए। 'Sunset Law' के अंतर्गत निर्धारित तिथि तक राजस्व जमा न करने पर ज़मींदारी नीलाम हो जाती थी। इससे औपनिवेशिक राज्य को राजस्व की निश्चितता मिली, किंतु किसान राज्य-संरक्षण से वंचित होकर ज़मींदारों पर पूर्णतः निर्भर हो गए।
मुख्यतः Madras और Bombay Presidencies में लागू इस व्यवस्था ने मध्यस्थों को दरकिनार कर राज्य और व्यक्तिगत कृषकों (ryots) के बीच प्रत्यक्ष बंदोबस्त स्थापित किया। Permanent Settlement के विपरीत, राजस्व आवधिक रूप से संशोधित होता था। तथापि, खराब फसल या प्राकृतिक आपदा में राजस्व-माफी की कोई सुनिश्चित व्यवस्था नहीं थी, जिससे ऋणग्रस्त ryots साहूकारों और भूमि-अन्यारोपण की ओर धकेले गए।
दोनों व्यवस्थाओं ने कृषि-निवेश की अपेक्षा राजस्व-निष्कर्षण को प्राथमिकता दी। Permanent Settlement में ज़मींदारों को भूमि-सुधार का प्रोत्साहन नहीं था। Ryotwari क्षेत्रों में बार-बार अकाल पड़े, क्योंकि फसल-विफलता के बावजूद राजस्व-दबाव बना रहा — यह किसान-भेद्यता के प्रति संरचनात्मक उदासीनता को उजागर करता है।
स्वतंत्रता-पश्चात् भूमि-सुधार — ज़मींदारी उन्मूलन, काश्तकारी संरक्षण और भूमि-सीमा निर्धारण — औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्थाओं द्वारा उत्पन्न विकृतियों की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया थे। यह अनुभव प्रमाणित करता है कि कृषि-कल्याण से विच्छिन्न राजस्व-नीति संरचनात्मक असमानता और ग्रामीण भंगुरता को जन्म देती है।
औपनिवेशिक भू-राजस्व व्यवस्थाओं ने समता की अपेक्षा निष्कर्षण को अनुकूलित किया। प्रभावी कृषि-शासन के लिए राजस्व-तंत्र को कृषक-सुरक्षा, भूमि-निवेश और जलवायु-अनुकूलनशीलता के साथ संरेखित करना आवश्यक है — यह शिक्षा समकालीन कृषि-नीति-निर्माण में भी प्रासंगिक बनी हुई है।
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