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Modern India / Social Reformers — UPSC मुख्य परीक्षा मॉडल उत्तर

History · UPSC CSE
प्रश्न: राजा राम मोहन राय की बौद्धिक विरासत: पूर्वी दार्शनिक परंपराओं का तर्कसंगत, वैज्ञानिक एवं समतावादी आदर्शों के साथ समन्वय

प्रस्तावना

राजा राम मोहन राय भारतीय बौद्धिक आधुनिकता के प्रमुख शिल्पकार थे, जिन्होंने वेदांत दर्शन को Enlightenment युग की तर्कशीलता से जोड़कर एक ऐसी सुधारवादी दृष्टि प्रस्तुत की जो औपनिवेशिक अवमानना और देशज रूढ़िवाद — दोनों को चुनौती देती थी।

मुख्य बिंदु

1. पूर्वी दार्शनिक परंपराओं के प्रति गहन आदर

राय संस्कृत, अरबी एवं फारसी के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने Vedanta, इस्लाम तथा प्रारंभिक ईसाई ग्रंथों का गंभीर अध्ययन किया। उनकी रचना 'Tuhfat-ul-Muwahhidin' तथा Upanishads के अनुवाद भारत की दार्शनिक विरासत के प्रति उनके वास्तविक बौद्धिक सम्मान को प्रकट करते हैं। उनका तर्क था कि परवर्ती मिलावटों से मुक्त प्रामाणिक हिंदू परंपरा स्वयं एकेश्वरवादी एवं तर्कसंगत है।

2. तर्कशील एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समर्थन

राय ने पाश्चात्य वैज्ञानिक शिक्षा को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में प्रतिष्ठित किया और केवल संस्कृत-आधारित पाठ्यक्रम के स्थान पर गणित, प्राकृतिक दर्शन एवं रसायन विज्ञान की शिक्षा का पक्ष लिया। उनका मत था कि अनुभवजन्य तर्कशीलता ही जाति-भेद और लैंगिक उत्पीड़न को पोषित करने वाले अंधविश्वास को नष्ट कर सकती है। Atmiya Sabha जैसी संस्थाओं की स्थापना इसी शैक्षणिक प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति थी।

3. मानवीय गरिमा एवं सामाजिक समता का सिद्धांत

सती प्रथा के विरुद्ध उनका निरंतर अभियान, जो Regulation of 1829 के रूप में फलीभूत हुआ, केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि स्त्री की सार्वभौमिक गरिमा के सिद्धांत पर आधारित था। उन्होंने जाति-भेद का विरोध किया और समान नागरिक अधिकारों की वकालत की, सामाजिक समता को राष्ट्रीय पुनर्जागरण की पूर्वशर्त के रूप में स्थापित किया, न कि पाश्चात्य आरोपण के रूप में।

4. समन्वय की पद्धति के रूप में सुधारवाद

राय का सुधारवाद न तो संपूर्ण पश्चिमीकरण था और न ही अविवेकी परंपरावाद। उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों का उपयोग उत्पीड़नकारी प्रथाओं को अवैध ठहराने के लिए किया, साथ ही संस्थागत आधुनिकता की माँग भी की। इस पद्धति ने उनके तर्कों को सांस्कृतिक वैधता और सार्वभौमिक नैतिक बल — दोनों प्रदान किए।

निष्कर्ष

दोनों कथन राय की द्विआयामी बौद्धिक प्रतिबद्धता को सटीक रूप से प्रतिबिंबित करते हैं। उनकी स्थायी प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि परंपरा और तर्क परस्पर विरोधी नहीं हैं — यह दृष्टि बहुलवादी एवं सुधारोन्मुख शासन-व्यवस्था के लिए आज भी नीतिगत महत्त्व रखती है।

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