अप्रैल 1930 का चटगाँव शस्त्रागार छापा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध का एक अत्यंत साहसिक कृत्य था, जो मुख्यधारा के असहयोग आंदोलन से परे क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की गहराई को प्रतिबिंबित करता है।
Surya Sen (Masterda) के नेतृत्व में इस छापे का उद्देश्य पुलिस एवं सहायक शस्त्रागारों पर अधिकार करना तथा चटगाँव को ब्रिटिश प्रशासनिक नियंत्रण से अलग करने हेतु टेलीग्राफ व टेलीफोन लाइनें काटना था। यह योजना केवल हथियार प्राप्ति नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक घोषणा के रूप में अभिकल्पित थी। इसने बंगाल के क्रांतिकारी दलों की परिपक्व संगठन-क्षमता को प्रदर्शित किया।
छापामारों ने शस्त्रागारों पर सफलतापूर्वक अधिकार कर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया, किंतु गोला-बारूद के भंडार प्रायः रिक्त पाए गए, जिससे अभियान की सैन्य उपयोगिता सीमित रही। तथापि इसका प्रतीकात्मक महत्त्व भौतिक लाभ से कहीं अधिक था और इसने बंगाल सहित समस्त देश में क्रांतिकारी भावना को प्रज्वलित किया।
Surya Sen की निकट सहयोगी Pritilata Waddedar ने 1932 में Pahartali European Club पर हुए आक्रमण का नेतृत्व किया। घायल होने के पश्चात् गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने विष ग्रहण किया और भारत के सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन की प्रारंभिक महिला शहीदों में से एक बनीं।
Surya Sen लगभग तीन वर्षों तक ब्रिटिश सेना से बचते रहे, किंतु 1933 में विश्वासघात के कारण गिरफ्तार हुए। एक विशेष न्यायाधिकरण द्वारा मुकदमा चलाए जाने के पश्चात् जनवरी 1934 में उन्हें फाँसी दी गई, जिससे वे बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रतिनिधि प्रतीक बन गए।
चटगाँव छापा यह स्थापित करता है कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन एकरेखीय नहीं था — सशस्त्र प्रतिरोध, यद्यपि अंततः दमित हुआ, ने औपनिवेशिक सत्ता को यह स्वीकार करने पर विवश किया कि राष्ट्रवाद साम्राज्यवादी शक्ति से सीधे टकराने की क्षमता रखता है।
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