भारत की संविधान सभा ने दो अनन्य दायित्वों का निर्वहन किया — संविधान का प्रारूपण तथा 1952 के प्रथम आम चुनावों तक अनंतिम संसद के रूप में कार्य, जिसने औपनिवेशिक शासन से लोकतांत्रिक स्वशासन की ओर निर्बाध संक्रमण सुनिश्चित किया।
26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के पश्चात् संविधान सभा, संक्रमणकालीन उपबंधों के Article 379 के अंतर्गत अनंतिम संसद में रूपांतरित हो गई। इस व्यवस्था ने शासन में विधायी रिक्तता को रोका। संविधान का निर्माण करने वाले वही सदस्य संसदीय कार्यों का भी निष्पादन करते रहे, जिससे संस्थागत सुसंगति बनी रही।
जनवरी 1950 से अप्रैल 1952 के मध्य अनंतिम संसद ने नागरिकता, जन-प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक पुनर्गठन से संबंधित महत्त्वपूर्ण विधान अधिनियमित किए। इस काल ने यह प्रमाणित किया कि संविधान-निर्माण और सामान्य विधि-निर्माण, यद्यपि स्वभाव में भिन्न हैं, एक ही विचार-विमर्श निकाय द्वारा बिना किसी कार्य-क्षति के संचालित किए जा सकते हैं।
1951-52 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर संपन्न प्रथम आम चुनावों ने अनंतिम संसद का स्थान पूर्णतः निर्वाचित लोक सभा को दिया। इस संक्रमण ने विधायिका को नवीन लोकतांत्रिक वैधता प्रदान की और उस वचन को पूर्ण किया जो प्रस्तावना में 'हम, भारत के लोग' के रूप में निहित था।
यह अंतरिम व्यवस्था व्यावहारिक राजनीतिक कौशल का परिचायक थी — स्वतंत्रता के तत्काल पश्चात् शासन को बाधित करना नवजात संस्थाओं को दुर्बल कर देता। अनुभवी संविधान-निर्माताओं को अनंतिम विधायकों के रूप में बनाए रखने से भारत उस अस्थिरता से बचा रहा जो कई उत्तर-औपनिवेशिक राज्यों को उनके संस्थापन-काल में झेलनी पड़ी।
संविधान सभा की द्विभूमिका एक सुविचारित संवैधानिक डिज़ाइन थी जिसने तात्कालिकता और वैधता के मध्य संतुलन स्थापित किया। 1952 के चुनावों ने भारत की लोकतांत्रिक संरचना को अनंतिम ढाँचे से पूर्णतः प्रतिनिधिक एवं संवैधानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया।
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