भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची देश की आधिकारिक भाषाओं को संस्थागत वैधता एवं राज्य-समर्थन प्रदान करती है। क्रमिक संशोधनों के माध्यम से इसका विस्तार एकीकृत ढाँचे के भीतर भाषायी बहुलवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
संविधान में मूलतः आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएँ सूचीबद्ध थीं। क्रमिक संशोधनों के माध्यम से यह संख्या बढ़कर 22 हो गई है। प्रत्येक नई भाषा का समावेश किसी भाषायी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान एवं प्रशासनिक आकांक्षाओं की राजनीतिक स्वीकृति को प्रतिबिंबित करता है।
21st Amendment Act, 1967 द्वारा विभाजन के दौरान विस्थापित समुदाय की भावनाओं को मान्यता देते हुए Sindhi को जोड़ा गया। 71st Amendment Act, 1992 द्वारा Konkani, Manipuri एवं Nepali सम्मिलित की गईं। Maithili को 92nd Amendment Act, 2003 द्वारा Bodo, Dogri एवं Santhali के साथ जोड़ा गया, जिससे कुल संख्या 22 हुई।
सम्मिलन से किसी भाषा को Official Languages Commission में प्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त होता है तथा Union Public Service परीक्षाओं में उसके उपयोग की अनुमति मिलती है। इससे सांस्कृतिक समुदायों को अपनी भाषायी विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु एक औपचारिक मंच भी उपलब्ध होता है।
Tulu, Bhojpuri एवं Rajasthani जैसी भाषाओं के सम्मिलन की माँगें अभी भी लंबित हैं, जिससे राजनीतिक दबाव बना रहता है। सम्मिलन हेतु वस्तुनिष्ठ मानदंडों का अभाव एक शासन-संबंधी चुनौती उत्पन्न करता है, क्योंकि निर्णय भाषायी या जनसांख्यिकीय आधार के स्थान पर निर्वाचन संबंधी विचारों से प्रभावित हो सकते हैं।
भारत की असाधारण भाषायी विविधता एवं प्रशासनिक सुसंगति के मध्य संतुलन स्थापित करने हेतु आठवीं अनुसूची में पारदर्शी एवं मानदंड-आधारित सम्मिलन प्रक्रिया अपरिहार्य है। निर्धारित मानकों सहित एक स्थायी भाषायी आयोग की स्थापना इस प्रक्रिया को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कर संवैधानिक अखंडता को सुदृढ़ करेगी।
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