नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन, 1951 के माध्यम से भूमि सुधार एवं सामाजिक-आर्थिक विधानों को न्यायिक चुनौती से संरक्षित करने हेतु सम्मिलित किया गया — संसदीय सर्वोच्चता और संवैधानिक अधिकारों के मध्य यह तनाव आज भी अनिर्णीत है।
नौवीं अनुसूची की स्थापना उन भूमि सुधार कानूनों की रक्षा के लिए की गई, जिन्हें न्यायालयों ने मौलिक अधिकारों — विशेषतः संपत्ति के अधिकार — के उल्लंघन के आधार पर निरस्त किया था। संसद का उद्देश्य था कि पुनर्वितरणकारी विधान दीर्घकालिक मुकदमेबाजी से मुक्त रहें और कृषि सुधार नीतियों का कार्यान्वयन बाधित न हो।
दीर्घकाल तक यह माना जाता रहा कि नौवीं अनुसूची न्यायिक पुनरावलोकन से सर्वथा मुक्ति प्रदान करती है। किंतु यह धारणा अतिरंजित थी, क्योंकि संविधान के मूल ढाँचे के सिद्धांत ने क्रमशः संसद की उस शक्ति को सीमित किया जिसके द्वारा वह किसी भी विधान को संवैधानिक परीक्षण से परे रख सकती थी।
उच्चतम न्यायालय ने I.R. Coelho v. State of Tamil Nadu (2007) में प्रामाणिक रूप से निर्धारित किया कि 24 अप्रैल, 1973 — अर्थात् Kesavananda Bharati निर्णय की तिथि — के पश्चात् नौवीं अनुसूची में सम्मिलित विधान, यदि मूल ढाँचे के अंग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होंगे। इस प्रकार उन्मुक्ति हेतु एक कालिक सीमा-रेखा निर्धारित हुई।
इस निर्णय ने संसद पर यह दायित्व अधिरोपित किया कि नौवीं अनुसूची में सम्मिलित विधान केवल औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि मूलतः संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हों। इससे विधायी प्रारूपण में अनुशासन आता है और राजनीतिक दृष्टि से सुविधाजनक किंतु संवैधानिक रूप से संदिग्ध विधानों के दुरुपयोग पर अंकुश लगता है।
नौवीं अनुसूची लोकतांत्रिक पुनर्वितरण और संवैधानिक अधिकारों के मध्य चिरंतन संवाद को प्रतिबिंबित करती है। Coelho निर्णय के पश्चात् यह सशर्त संरक्षण का साधन बन गई है — जो विधायी महत्त्वाकांक्षा को मूलभूत संवैधानिक आश्वासनों से आबद्ध रखने की अपेक्षा करती है।
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