संविधान की सातवीं अनुसूची संघ और राज्यों के बीच तीन सूचियों के माध्यम से विधायी अधिकारों का वितरण करती है, जो भारतीय संघवाद की संरचनात्मक आधारशिला है तथा यह निर्धारित करती है कि किसी विषय पर शासन का कौन-सा स्तर विधान बना सकता है।
List I (Union List) में रक्षा, विदेश नीति और परमाणु ऊर्जा जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय हैं, जिन पर केवल संसद विधान बना सकती है। List II (State List) में लोक व्यवस्था, कृषि और स्थानीय शासन जैसे विषय राज्य विधानमंडलों के लिए आरक्षित हैं। List III (Concurrent List) पर संसद और राज्य दोनों विधान बना सकते हैं, किंतु विरोध की स्थिति में संसदीय विधि प्रभावी होती है।
Article 248 किसी भी सूची में अनुल्लिखित विषयों पर अवशिष्ट शक्तियाँ विशेष रूप से संसद को प्रदान करता है। यह असमानता भारत को शास्त्रीय संघों से अलग करती है, जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ प्रायः घटक इकाइयों के पास होती हैं। यह केंद्रीकृत अभिकल्पना राष्ट्रीय एकीकरण की आवश्यकताओं के अनुरूप है।
Article 254 समवर्ती सूची के विवादों को संसदीय विधान को अध्यारोही प्रभाव देकर सुलझाता है, जब तक कि किसी राज्य विधि को राष्ट्रपति की अनुमति न मिली हो। यह प्रावधान शिक्षा, वन और दंड विधि जैसे विषयों पर एकसमान राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता के साथ राज्य स्वायत्तता का संतुलन स्थापित करता है।
सूचियों के बीच विषयों का स्थानांतरण — शिक्षा और वन को 42nd Amendment द्वारा Concurrent List में स्थानांतरित किया गया — यह दर्शाता है कि यह अनुसूची शासन आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील एक जीवंत दस्तावेज़ है। GST और पर्यावरण विनियमन जैसे क्षेत्रों में अतिक्रमण के विवाद केंद्र-राज्य संबंधों की परीक्षा लेते रहते हैं।
सातवीं अनुसूची एक संतुलित संघवाद को मूर्त रूप देती है — न पूर्णतः एकात्मक, न पूर्णतः संघीय। सहायकता के सिद्धांत से निर्देशित होकर सूची-आवंटन की समय-समय पर समीक्षा, विधायी सक्षमता को समकालीन शासन वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने हेतु अनिवार्य है।
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